दुर्गा मंदिर दुर्गा कुंड
दुर्गा कुंड मंदिर काशी के पुरातन मंदिरॊ मॆ सॆ एक है। इस मंदिर का उल्लॆख "काशी खंड" मॆ भी मिलता है। यह मंदिर वाराणसी कैन्ट से लगभग 5 कि॰मी॰ की दूरी पर है। लाल पत्थरों से बने अति भव्य इस मंदिर के एक तरफ "दुर्गा कुंड" है।
इस मंदिर में माँ दुर्गा "यंत्र" रूप में विरजमान है। इस मंदिर में बाबा भैरोनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, एवं माता काली की मूर्ति रूप में अलग से मंदिर है।
लोग यहाँ मांगलिक कार्य मुंडन इत्यादि में माँ के दर्शन कॆ लिये आतॆ है।
मंदिर के अंदर हवन कुंड है, जहाँ रोज हवन होते हैं।
कुछ लोग यहाँ तंत्र पूजा भी करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि शुंभ और निशुंभ राक्षसों का वध करने के बाद मां दुर्गा ने यहां विश्राम किया था। कहा जाता है कि यहां आदि शक्ति के रूप में माता का वास होता है और यह मंदिर प्राचीन काल से है। दुर्गा मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में बंगाल की रानी भवानी ने करवाया था। यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला में लाल पत्थरों से बनाया गया था। उस समय मंदिर के निर्माण में करीब 50 हजार रुपये की लागत आई थी।
देवी दुर्गा के केंद्रीय प्रतीक के रंगों से मेल खाने के लिए मंदिर को लाल रंग में रंगा गया है। यह मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है। दुर्गा कुंड के दर्शन और पूजन से वंशवृद्धि से लेकर धन-धान्य की संपूर्णता तक की मनौती पूर्ण होती है।
दुर्गा मंदिर वाराणसी के प्रमुख मंदिरों में से एक हैं और इस मंदिर को बंदर मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर को गेरू से लाल रंग में रंगा गया है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर में विराजित देवी दुर्गा की मूर्ती अपने आप प्रकट हुई थी, इसका निर्माण नहीं किया गया था। अगर आप वाराणसी की यात्रा करने जा रहे हैं तो इस मंदिर को भी अपनी लिस्ट में जरुर शामिल करें।
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।


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