आत्मविरेश्वर महादेव -काशीखण्डोक्त :
विधायैकं जागरणम् नरो विरेशमर्चयन ।
भूतायां नैव गृहणाति शरीरं पाञ्चभौतिकं ।।
-(काशीखंड)
चतुर्दशी तिथि को जागरण करके वीरेश्वर का पूजन करता है वह फिर कभी पांचभौतिक शरीर को नही पाता.
स्कन्दपुराण के काशी खण्ड के कथा के अंतर्गत -
प्राचीनकाल मे एक अमित्रजीत नामक राजा बड़े ही धर्मात्मा , सर्वगुण सम्पन्न , प्रजापालक , यशश्वी तथा उदारता इत्यादि अनेक राज्योचित गुणों से सम्पन्न धर्मपूर्वक राज्य करते थे ।
वह विष्णु थे और और विष्णु जी के प्रसन्नता के लिए प्रजा सहित एकादशी के व्रत का नियम पूर्वक पालन करते थे जिसमें दूध मुहे बालक और पशु पक्षी भी अनुसरण करते थे और इनके राज्य में प्रत्येक घर मे विष्णु जी के बड़े बड़े मंदिर शोभायान थे ।
एक बार नारद जी राजा की विष्णु जी के प्रति प्रेम भाव को देखने के लिए और उनके उपकार के लिए पाताल लोक से सीधे इनके पास पहुँचे , राजा अमित्रजीत ने भी उनका विनम्रतापूर्वक सत्कार किया । नारद जी ने भी उनका अभिवादन स्वीकार किया और बोला कि -
यौवनं धनमायुष्यं पद्मिनीजलबिन्दुवत ।
अतीवचपलं ज्ञात्वाःच्युतमेकं समाश्रयेत ।।
-(काशीखण्ड्)
यौवन ,धन ,आयु आदि को कमल के पत्ते पर पड़े हुवे जल बिंदु के समान अत्यंत चपल जानकर अकेले भगवान विष्णु की शरण लेनी चाहिए ।
इसके बाद नारद जी ने प्रसन्न होकर बोला कि वह पाताललोक की चम्पकवती नगरी से आरहे है और वही पर विद्याधर की पुत्री मलयंगन्धिनी ने मुझे प्रणाम पूर्वक निवेदन किया है कि देवऋषि ! मेरे ही भाग्य से ही आपका दर्शन हुआ है । अतः आप मेरा कल्याण करें , मैं अपने पिता के गंधमादन पर बने हुवे उद्यान में अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी , उसी समय पाताललोक का दुराचारी दानव कंकालकेतु ने मेरा अपहरण कर लिया है ।
मैंने देवी भगवती की आराधना से बाल्यावस्था ही यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि कोई विष्णु भक्त ही मेरा पाणी ग्रहण कर सकता है । मैं अभी तक कुँवारी हूं । आज से तीसरे दिन वह मेरा कान्यत्व विनिष्ट कर मेरा पाणी ग्रहण करना चाहता है ।
अतः आप विष्णुभक्त राजा अमित्रजीत को मेरा निवेदन कह कर उन्हें इस पाताललोक में आने का मार्ग बताकर मेरे रक्षा के लिए भेज दे । मैंने अपने हृदय से उनका वरण कर लिया है ।
वे यहाँ आकर इस दुष्ट दानव को उसी के अमोघ त्रिशूल से वध कर शास्त्रोक्त विधि से मेरा पाणी ग्रहण करें ।इसके बाद नारद जी ने राजा को वहां पहुचने का मार्ग बता कर तुरन्त अंतर्ध्यान होगये ।
तत्पश्चात राजा अमित्रजीत निर्देशित मार्ग से पाताललोक की चम्पकवती नगरी पहुँच गए और वहां पर एक झूले पर झूलती हुई साक्षात लक्ष्मी के समान राजकुमारी मलयंगन्धिनी को देखा, राजा को देखते ही वह समझ गयी की नारद ऋषि ने उन्हें भेजा है ।
फिर उसने राजा को कंकाल केतु के आने तक शस्त्रागार में छुपने को बोला ।
सायंकाल होने तक वह दुष्ट कंकाल केतु अपने घर आया और कुमारी मलयंगन्धिनी को अनेक रत्न निर्मित आभूषण देकर शादी के लिए तैयार होने को कहा । इतना कह कर वह अजेय दानव अपने शयन कक्ष में अपने त्रिशूल के साथ चला गया ।
इसके बाद मलयंगन्धिनी ने उसके कक्ष में जा कर उसका आमोघ त्रिशूल ले कर अमित्रजीत को दे दिया और बताया कि इसी वरदानी त्रिशूल के कारण ही यह कंकाल केतु दानव अजेय बना हुआ है ।
राजा ने भी त्रिशूल ग्रहण किया पर किसी सोते हुवे व्यक्ति को मारना महापाप है इसको सोचते हुवे दानव को लात मार कर जगाया और भयंकर युद्ध किया जिसमें त्रिशूल के प्रहार से कंकाल केतु का अंत होगया ।
तभी वहां पर नारद मुनि उपस्थित होकर उनदोनो को आशीर्वाद देते हुवे उनका पाणी ग्रहण सम्पूर्ण कराया और उनके द्वारा निर्देशित होकर दोनों नव दम्पति काशी आगये ।
इनदोनो का काशी में भव्य स्वागत हुआ और वह दोनों सुख पूर्वक काशी वास् करने लगे , तत्पश्चात रानी ने मनोनुकूल पुत्र के प्राप्ति के उद्देश्य से राजा के सहमति के साथ अभीष्ट तृतीया का व्रत विधि पूर्वक सम्पूर्ण किया ।
रानी ने पार्वती जी से प्रार्थना कर के बोला कि उसको साक्षात विष्णु के अंश से उत्पन्न पुत्र की लालसा है जो जन्म लेते ही स्वर्गलोक चला जाय और लौट कर काशी में आजाये और परम शिव भक्त बने और बिना मेरा दुधपान किये ही 16 वर्ष की आयु वाला होजाये माता पार्वती भी उनके मनोरथ को पूर्ण कर दिया कुछ समय बाद रानी ने एक सुंदर राज कुमार को जन्म दिया जिसके जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था जो राजा के जीवन को संकट में डालने वाला था ।
रानी ने भी दासी को बुला कर राजपुत्र को पँचमुद्र महापीठ में विकटा नामक मातृका के पास भेज दिया और वहाँ रखकर दासी को प्रार्थना करने को बोला "यह बालक आपके ही आशीर्वाद से उत्पन्न हुआ है और रानी अपने पति के रक्षा के लिए इस मूल नक्षत्र में जन्मे बालक को आपसे पास भेजा है ।
रानी के कथनानुसार दासी उस नवजात बालक को वहां छोड़ कर चली आई , तभी विकटा भवानी ने भी योगनियों को बुला कर इस बालक की रक्षा के लिए मातृकाओं के पास भिजवा दिया ।
मातृकाओं ने उस सुंदर राजपुत्र से उसके माता पिता और निवास स्थान पूछा जब बालक ने कुछ भी नही बोला तोह उन्होंने बालक को जगत कृति का आशीर्वाद दे कर पुनः विकटा देवी के पास भिजवा दिया और कहा कि पँचमुद्र महापीठ के प्रभाव और भगवती की कृपा से इसे सिद्धि प्राप्त होगी और पैरों में राज चिन्ह होने के कारण यह समयानुसार राजा बनेगा ।
पँचमुद्र महमीठ पर विकटा देवी के समीप पहुँच कर वह 16 वर्षीय बालक विश्वनाथ की कठोर तपस्या में लीन हो गया।
निश्छल राजकुमार के तप से उमापति बहुत ही प्रसन्न होकर स्वयंभू रूप से सात पाताल का भेदन करते हुवे एक लिंग के रूप में स्वयं महादेव प्रकट हुवे और वर मांगने को कहा
राजपुत्र ने कहा कि :
देवदेव महादेव यदि देयो वरो मम ।
तदत्र भवता स्थेयं भवतापहृतं सदा ।।आस्मिलिङ्गे स्थितेः शम्भो कुरु भक्तसमीहितं।
विना मुद्रादिकरणं मन्त्रेनाःपि विना प्रभो ।।दिश सिद्धिं परामत्र दर्शनात् स्पर्शनान्न्तेः ।
अस्य लिङ्गष्य ये भक्ता मनोवाक्काय कर्मभिः।।सैदेवाःनुग्रःहस्तेषु कर्तव्यो वर ऐष मे ।
इति तद्वरमकर्ण्य लिङ्गरुपोःवदत्प्रभुः ।।
हे देवाधिदेव ! महादेव ! यदि मुझको वर देना ही है, तो यही मिले कि, आप संसार के तापो के नाशक होकर यहां पर सदैव रहा करे। हे शम्भो ! आप इस लिंग में विराजमान रहकर भक्त लोगो का मुद्रा आदि दान करने के बिना और मंत्र जप करने के बिना ही अभीष्ट फल दिया करें ।
हे विभो ! यहाँ पर केवल दर्शन स्पर्शन और प्रणाम करने ही से आप उत्तम सिद्धि को देवे और जो लोग मनसा , वचसा, कर्मणा और सरीर से इस लिंग के भक्त होवे आप उन पर सैदेव अनुग्रह करे । बस मैं यही वर मांगता हूं । इस प्रकार से उसका वर सुनकर स्वयंभू स्वरूप भगवान ने एवमस्तु कहकर यह कहा कि --
विष्णु भक्त राजा अमित्रजीत तुम्हारे पिता और विद्याधर कुमारी पार्वती देवी की परम भक्त रानी मलयंगन्धिनी तुम्हारी माता है , और तुम्हारा नाम वीर होने के नाते इस स्वयंभू लिंग का नाम तुम्हारे नाम से ही (वीरेश्वर) जाना जाएगा और आज से मेरी आत्मा सदैव इस लिंग में बनी रहेगी ।
और अंत मे शिव जी आत्मवीरेश्वर लिंग की महिमा और काशी के अन्य तीर्थ स्थानों की महिमा बताते हुवे इसी आत्मविरेश्वर लिंग में अंतर्ध्यान होगये ।
पता - सिंधिया घाट पर आत्मविरेश्वर मंदिर ck 7/ 158 चौक वाराणासी।

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