-: बाबा कीनाराम की जीवनी :-
आज हम भारत के संत की श्रंखला में आपके अघोरेश्वर बाबा कीनाराम की जीवनी लेकर आए हैं। जिन्होंने भारत में छठी शताब्दी में सुप्त हो चुकी अघोर परंपरा को पुनर्जीवित किया। बाबा कीनाराम ने क्रीं कुंड बनारस में अघोर परंपरा की सर्वोच्च गद्दी की स्थापना की।
भारत भूमि सदैव से ही संत महात्माओं की तपस्थली रही है। इस आध्यात्मिक उर्वरा भूमि पर समय समय पर अनेक चमत्कारी संतों ने अवतरित होकर अपने व्यक्तित्व, कृतित्व, और चमत्कारों से जनसामान्य को आल्हादित और आप्लावित किया है।
साथ ही उन्होंने भारत की आध्यात्मिक समृद्धि और संपन्नता को सम्पूर्ण विश्व में उद्घोषित भी किया है। इसी श्रृंखला में अघोर परंपरा को पुनर्जीवित करने वाले बाबा कीनाराम नाम विशेष उल्लेखनीय है।
बाबा कीनाराम भारत के चंदौली में पैदा हुए एक अघोरी तपस्वी थे। कीनाराम को कुछ स्रोतों से अघोरी संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है, हालांकि इस संप्रदाय का उल्लेख कई प्राचीन हिंदू धार्मिक ग्रंथों में किया गया है। उन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता था ।
अघोराचार्य बाबा कीनाराम का जन्म 1601 ई. में अघोर चतुर्दशी (भाद्रपद) को भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिले (अब चंदौली ) के रामगढ़ गाँव में हुआ था।जब निःसंतान दंपत्ति श्री अकबर सिंह और मनसा देवी को आखिरकार संतान मिली तो पूरा क्षेत्र हर्षित हो गया। जन्म के बाद तीन दिन तक बच्चा न तो रोया और न ही अपनी मां के स्तनों को चूसा। तीन दिनों के बाद जब तीन भिक्षु (जिन्हें भगवान सदाशिव-ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में माना जाता था) वहां आए, बच्चे को अपनी बाहों में लिया और उसके कानों में कुछ फुसफुसाया। आश्चर्यजनक रूप से बच्चा जन्म के बाद पहली बार रोने लगा। उसी दिन से महाराज श्री (बाबा किनाराम) के लोलार्क षष्ठी उत्सव को संस्कार (आमतौर पर जन्म के पांच दिनों के बाद हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला षष्ठी) के रूप में मनाया जाता है। बलूचिस्तान (पाकिस्तान) के ल्यारी जिले में हिंगलाज माता ( अघोरा की प्रमुख देवी) के आशीर्वाद से , कीनाराम ने सामाजिक कल्याण और मानवता के संदेश के साथ अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की। "गुरु" (आध्यात्मिक शिक्षक) के रूप में जाने जाने वाले बाबा कालूराम ने कीनाराम में "अघोर" की चेतना जागृत की। बाद में कीनाराम ने लोगों की सेवा के लिए खुद को वाराणसी शहर में स्थापित किया और उन्हें प्राचीन ज्ञान से अवगत कराया।
उन्होंने अपनी पुस्तकों *विवेकसर*, *रामगीता*, *रामरसल* और *उनमुनिराम* में अघोर के सिद्धांतों का उल्लेख किया है। बाबा कीनाराम द्वारा लिखित *विवेकसर* नामक पुस्तक को अघोर के सिद्धांतों पर सबसे प्रामाणिक ग्रंथ कहा जाता है। अपने दौरे के दौरान कीनाराम पहले कुछ दिनों के लिए "गृहस्थ संत", शिव दास के आवास पर रुके। शिव दास ने किनाराम की गतिविधियों को बहुत बारीकी से देखा और असाधारण गुणों से प्रभावित हुए, यह संदेह करते हुए कि वे अवतार या पुनर्जन्म हैं।
एक दिन गंगा नदी में स्नान के लिए जाते समय, शिव दास ने अपना सारा सामान लड़के कीनाराम को सौंप दिया और पास की झाड़ियों में छिप गए। उन्होंने देखा कि जैसे-जैसे लड़का करीब आता गया गंगा नदी बहुत बेचैन हो जाती है। पानी का स्तर बढ़ने लगा और कीनाराम के पैर छूकर ही अचानक नीचे उतर गया। कीनाराम को अघोर परंपरा के युग के सबसे बड़े संत के रूप में जाना जाता था जिसे भगवान शिव परंपरा के रूप में भी जाना जाता है।
सन्यासी जीवन :-
घर छोड़ने के बाद वे घूमते हुए गाजीपुर जिले के कारों ग्राम जोकि अब बलिया जिले में है, वहां पहुंचे। वहां रामानुजी परंपरा के संत शिवराम की बड़ी प्रसिद्धि थी। कीनाराम जी उनकी सेवा में जुट गए और उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की।
एक दिन शिवराम जी ने इन्हें पूजा सामग्री लेकर गंगातट पर चलने को कहा। कीनाराम जी सामग्री लेकर गंगातट से थोड़ी दूर बैठ गए। थोड़ी देर में गंगा का जल बढ़कर उनके पैरों तक पहुंच गया। यह चमत्कार देखकर शिवरामजी ने इनको दीक्षा दी थी।
बाबा कीनाराम स्थल :-
कीनाराम बाबा कीनाराम स्थल (दुनिया भर में अघोर संप्रदाय का मुख्यालय / तीर्थयात्री) के पहले संस्थापक/ पीठदेश्वर थे और १७० वर्षों तक जीवित रहे।
बाबा कीनाराम स्थल पर समाधि लेने से पहले (जहां उनके शरीर को एक मकबरे में दफनाया जाता है, साथ ही यंत्र में देवी हिंगलाज (देवी की उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक रहस्यमय ज्यामितीय आकार) के साथ।
विरासत :-
उनकी जयंती चंदौली जिले में प्रतिवर्ष मनाई जाती है । 2019 में, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने समारोह में भाग लिया और घोषणा की कि उनके जन्मस्थान को यूपी सरकार द्वारा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा।
काशीनरेश को शाप :-
तत्कालीन काशीनरेश महाराज चेतसिंह शिवभक्त थे। वे अपने महल में एक शिवालय का निर्माण करा रहे थे। आज उसकी प्राणप्रतिष्ठा थी। सारा राजमहल सजा धजा था। स्वयं महाराज घूम घूम कर सारी व्यवस्था देख रहे थे।
काशी के सभी गणमान्य लोग महल में उपस्थित थे। सारे साधू संत भी बुलाये गए थे। पहरेदारों को सख्त आदेश थे कि कोई अवांछनीय व्यक्ति इस शुभ अवसर पर महल में न आने पाए।
अचानक महाराज चेतसिंह की नजर सामने खड़े एक अस्तव्यस्त वेशभूषा वाले जटाजूट धारी साधू पर पड़ी। उसे देखते ही राजा क्रोधित होकर बोले, “इस नरपिशाच को किसने अंदर आने दिया? इसे तुरंत बाहर निकालो।”
यह सुनकर वह सन्यासी भी क्रोधित हो गया। सन्यासी का मेघगर्जन स्वर पूरे महल में गूंज उठा, “काशीनरेश! तुझे अपनी वीरता और वैभव का घमंड हो गया है। तूने एक अघोरी बाबा का अपमान किया है। अब शीघ्र ही तेरी वीरता और वैभव दोनों का पतन होगा।”
“जिस किले और महल में तू रह रहा है। यहां उल्लू और चमगादड़ रहेंगे। कबूतर बीट करेंगे। काशी में म्लेक्षों का राज होगा। काशी का राजवंश आज के बाद संतानहीन होगा। सदा सर्वदा के लिए, यह एक अघोरी का श्राप है।”
यह कहकर वह अघोरी बाबा हवा के झोंके की तरह गायब हो गया। वह अघोरी कोई और नहीं अघोरेश्वर बाबा कीनाराम थे। महाराज चेतसिंह के निजी सचिव सदानंद बक्शी बाबा कीनाराम की शक्तियों से परिचित थे।
वे बाबा के आश्रम पहुंचे और राजा को क्षमा करने की प्रार्थना की। लेकिन कीनाराम बाबा ने कहा कि अब बात जुबान से निकल चुकी है। यह सत्य होकर रहेगी। तब सदानंद ने कहा, “बाबा! हम लोगों का क्या होगा?”
बाबा ने उत्तर दिया, “जब तक तुम्हारे वंश के लोग अपने नाम के साथ ‘आनंद’ शब्द लगाते रहेंगे। तब तक तुम्हारा वंश अनादि काल तक चलता रहेगा। कालांतर में उन्हीं के वंशज डॉ0 संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।”
अब काशीनरेश का हाल सुनिये। थोड़े समय बाद अंग्रेजों ने काशी पर हमला किया। जिसमें महाराज चेत सिंह को शिवाले का किला छोड़ कर भागना पड़ा। काशी पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। वह महल निर्जन और सुनसान हो गया। वहां सचमुच उल्लू और चमगादड़ रहने लगे।
आज भी वहां इन्हीं पक्षियों का डेरा है। बाबा कीनाराम के श्राप के अनुसार ही काशी का राजवंश संतान के लिए तरस गया। लगभग 200 वर्षों तक काशी राजवंश गोद ले लेकर चलता रहा।
बाद के राजाओं ने बहुत हवन, अनुष्ठान कराए। सिद्धों, संतों से शापमुक्ति की प्रार्थना की। लेकिन कोई शाप का प्रभाव खत्म नहीं कर पाया। कालांतर में काशी के सर्वाधिक योग्य, जनप्रिय एवं भक्त राजा विभूतिनारायण सिंह ने बाबा कीनाराम के उत्तराधिकारी महासिद्ध अघोरेश्वर भगवान राम के चरणों में बैठकर शापमुक्ति की प्रार्थना की।
द्रवित होकर उन्होंने शाप के प्रभाव को कुछ कम कर दिया और कहा, “इसी गद्दी पर ग्यारहवें उत्तराधिकारी के रूप में स्वयं बाबा कीनाराम 9 वर्ष की अवस्था में आरूढ़ होंगे। जब वे तीस वर्ष के होंगे। तब उनकी कृपा से काशी राजवंश शापमुक्त होगा।
वह दिन 10 फरवरी सन 1978 को आया। जब महाराज बाबा सिद्धार्थ गौतम अघोरपंथ की सर्वोच्च गद्दी पर मात्र 9 वर्ष की अवस्था में विभूषित हुए। उसके बाद सन 2000 में काशी राजवंश शापमुक्त हुआ। 200 वर्ष बाद पहली संतान का जन्म हुआ।
भगवान दत्तात्रेय के दर्शन :-
वहां से आगे बढ़ते हुए बाबा गिरनार पर्वत पर पहुंचे। जो औघडपंथी संतों की पुण्य तपोभूमि मानी जाती है। यहीं साक्षात शिव के अवतार महागुरु दत्तात्रेय जी ने बाबा कीनाराम को दर्शन दिए। इससे पूर्व दत्तात्रेय जी ने गुरु गोरखनाथ को भी यहीं दर्शन दिए थे।
कीनाराम बाबा का कृतित्व :-
यही औघड़ों का स्वभाव है। प्रसन्न हो जायें तो सब कुछ दे दें। नाराज हो जाएं तो जो है वह भी छीन लें। लेकिन बाबा ने काशीनरेश के अलावा और किसी का अहित नहीं किया। अपने जीवनकाल में उन्होंने न जाने कितने रोगियों को रोगमुक्त किया। कितनों की समस्याएं दूर कीं। कई मृत लोगों के परिजनों के रुदन से द्रवित होकर उन्हें पुनर्जीवित किया।
एक जनश्रुति है कि एक बार एक निःसंतान महिला भक्तशिरोमणि तुलसीदासजी के पास पुत्र की याचना हेतु पहुंची। तुलसीदासजी ने बताया कि तुम्हारे भाग्य में संतानसुख नहीं है। अतः तुम्हे संतान नहीं हो सकती।
वह महिला बाबा कीनाराम के पास पहुंची। बाबा ने अपनी छड़ी पांच बार उसके माथे से छुआई। जिसके फलस्वरूप उसके पांच पुत्र हुए। तभी से यह कहावत प्रचिलित हो गयी कि “जो न कर सकें राम। वह करें कीनाराम।”
बाबा कीनाराम की मृत्यु :-
170 वर्षों तक जनकल्याण के लिए अनेक लीलाएं करने के बाद बाबा कीनाराम ने सन 1770 में समाधि ले ली।
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