-: संत रविदास से संबंधित तथ्य :-
जन्म: 1377 एडी में (अर्थात् विक्रम संवत-माघ सुदी 15, 1433, हालाँकि कुछ लोगों का मानना है कि ये 1440 एडी था) सीर गोवर्धनपुर, वाराणसी, यूपी।
पिता: श्री संतोक दास जी
माता: श्रीमती कालसा देवी जी
दादा: श्री कालूराम जी
दादी: श्रीमती लखपती जी
पत्नी: श्रीमती लोनाजी
पुत्र: विजय दास जी
मृत्यु: वाराणसी में 1540 एडी में।
पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना :-
संत रविदास अथवा रैदास एवं किंचित उच्चारण भेद के साथ इसी से मिलनेवाले अनेक नाम देश के विभिन्न भागों में प्रचलित हैं। सर्वप्रथम इस विषय में निर्णय की आवश्यकता है कि यह एक ही संत के विभिन्न नाम हैं या एक से अधिक संतों का व्यक्तित्व एक ही व्यक्ति पर आरोपित हो गया है। इस संबंध में मिलनेवाले विभिन्न नाम हैं--रविदास, रैदास, रादास, रुद्रदास, सईदास, रयिदास, रोहीदास, रोहिदास, रूहदास, रमादास, रामदास, हरिदास। इनमें से रविदास तथा रैदास दो नाम तो ऐसे हैं, जो दोनों ही संत रैदास की रचनाओं में उपलब्ध होते हैं। शेष नाम उनकी रचनाओं में कहीं नहीं मिलते। वे सभी नाम विभिन्न अन्य लेखकों या अन्य व्यक्तियों के द्वारा उनके लिए प्रयोग किए गए हैं। गुरुग्रंथ साहिब में रविदास नाम से एक श्लोक तथा चालीस पद संकलित हैं। इस रचनाकार के विषय में काशी का निवासी तथा जाति से चमार होने का वर्णन मिलता है, किंतु साथ ही ग्रंथ साहिब में ही अन्य स्थलों पर ऐसे भी पद मिलते हैं; जिनमें काशी के निवासी चमार रैदास का प्रसंग मिलता है। इससे हम इस निर्णय पर सरलतापूर्वक पहुँच सकते हैं कि ग्रंथ साहिब के रविदास तथा रैदास एक ही व्यक्ति थे।
रविदास का जन्मदिन :-
रविदास के जन्मदिन के विषय में संप्रदाय में विश्वास किया जाता है कि उनका जन्मदिन रविवार और तिथि माघी पूर्णिमा थी। इसी दिन सारे देश में रविदासी भाई उनकी जन्मतिथि प्रतिवर्ष मनाते हैं। किसी अन्य प्रमाण के अभाव में हमें माघी पूर्णिमा को ही रविदास की जन्मतिथि मान लेने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
रविदास का जन्मस्थान :-
सामान्यतः रविदास पंथी भाई रविदास के जन्मस्थान के विषय में एकमत नहीं हैं। इस विषय में विभिन्न मत चलते हैं। इन संपूर्ण मतों को यदि शीर्षकबद्ध किया जाए तो इन मतों को हम दो शीर्षकों में रख सकते हैं--
(1) रविदास पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निवासी थे। पश्चिमी प्रदेश में भी अनेक संभावनाएँ सामने उभर आई हैं
(क) पश्चिमी उत्तर प्रदेश के।
(ख) गुजरात-राजस्थान के।
(ग) राजस्थान में मेवाड़ के।
(घ) राजस्थान में माण्डोगढ़ या मंडावर के निवासी।
(2) रविदास पूर्वी प्रदेश, बनारस के आसपास के रहनेवाले थे। इस मत में भी दो संभावनाएँ सामने आती हैं--
(क) रविदास बनारस के निवासी थे।
(ख) रविदास बनारस के पास ही महुआडीह के निवासी थे।
गुरु रविदास के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निवासी होने की कल्पना रविदास महासभा के कुछ अनुयायियों द्वारा की गई है। उनका कथन है कि गुरु रविदास पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निवासी थे और काशी का सांस्कृतिक महत्त्व सुनकर बाद में वे वहाँ जाकर रहने लगे थे।
ये अनुयायी अपने समर्थन में किसी भूतपूर्व रविदासी महासभा के अधिवेशन की अध्यक्षता के पद से दिए गए लाला लाजपत राय के भाषण का उल्लेख करते हैं, किंतु इस विचार का कोई पुष्ट प्रमाण नहीं दिया जा सका है।
रविदास की प्रारंभिक शिक्षा :-
बचपन में संत रविदास अपने गुरु पंडित शारदा नंद के पाठशाला गये जिनको बाद में कुछ उच्च जाति के लोगों द्वारा रोका किया गया था वहाँ दाखिला लेने से। हालाँकि पंडित शारदा ने यह महसूस किया कि रविदास कोई सामान्य बालक न होकर एक ईश्वर के द्वारा भेजी गयी संतान है अत: पंडित शारदानंद ने रविदास को अपनी पाठशाला में दाखिला दिया और उनकी शिक्षा की शुरुआत हुयी। वो बहुत ही तेज और होनहार थे और अपने गुरु के सिखाने से ज्यादा प्राप्त करते थे। पंडित शारदा नंद उनसे और उनके व्यवहार से बहुत प्रभावित रहते थे उनका विचार था कि एक दिन रविदास आध्यात्मिक रुप से प्रबुद्ध और महान सामाजिक सुधारक के रुप में जाने जायेंगे।
पाठशाला में पढ़ने के दौरान रविदास पंडित शारदानंद के पुत्र के मित्र बन गये। एक दिन दोनों लोग एक साथ लुका-छिपी खेल रहे थे, पहली बार रविदास जी जीते और दूसरी बार उनके मित्र की जीत हुयी। अगली बार, रविदास जी की बारी थी लेकिन अंधेरा होने की वजह से वो लोग खेल को पूरा नहीं कर सके उसके बाद दोनों ने खेल को अगले दिन सुबह जारी रखने का फैसला किया। अगली सुबह रविदास जी तो आये लेकिन उनके मित्र नहीं आये। वो लंबे समय तक इंतजार करने के बाद अपने उसी मित्र के घर गये और देखा कि उनके मित्र के माता-पिता और पड़ोसी रो रहे थे।
उन्होंने उन्हीं में से एक से इसका कारण पूछा और अपने मित्र की मौत की खबर सुनकर हक्का-बक्का रह गये। उसके बाद उनके गुरु ने संत रविदास को अपने बेटे के लाश के स्थान पर पहुँचाया, वहाँ पहुँचने पर रविदास ने अपने मित्र से कहा कि उठो ये सोने का समय नहीं है दोस्त, ये तो लुका-छिपी खेलने का समय है। जैसै कि जन्म से ही गुरु रविदास दैवीय शक्तियों से समृद्ध थे, रविदास के ये शब्द सुनते ही उनके मित्र फिर से जी उठे। इस आश्चर्यजनक पल को देखने के बाद उनके माता-पिता और पड़ोसी चकित रह गये।
वैवाहिक जीवन :-
भगवान के प्रति उनके प्यार और भक्ति की वजह से वो अपने पेशेवर पारिवारिक व्यवसाय से नहीं जुड़ पा रहे थे और ये उनके माता-पिता की चिंता का बड़ा कारण था। अपने पारिवारिक व्यवसाय से जुड़ने के लिये इनके माता-पिता ने इनका विवाह काफी कम उम्र में ही श्रीमती लोना देवी से कर दिया जिसके बाद रविदास को पुत्र रत्न की प्रति हुयी जिसका नाम विजयदास पड़ा।
शादी के बाद भी संत रविदास सांसारिक मोह की वजह से पूरी तरह से अपने पारिवारिक व्यवसाय के ऊपर ध्यान नहीं दे पा रहे थे। उनके इस व्यवहार से क्षुब्द होकर उनके पिता ने सांसारिक जीवन को निभाने के लिये बिना किसी मदद के उनको खुद से और पारिवारिक संपत्ति से अलग कर दिया। इस घटना के बाद रविदास अपने ही घर के पीछे रहने लगे और पूरी तरह से अपनी सामाजिक मामलों से जुड़ गये।
बाद का जीवन :-
बाद में रविदास जी भगवान राम के विभिन्न स्वरुप राम, रघुनाथ, राजा राम चन्द्र, कृष्णा, गोविन्द आदि के नामों का इस्तेमाल अपनी भावनाओं को उजागर करने के लिये करने लगे और उनके महान अनुयायी बन गये।
मीरा बाई से उनका जुड़ाव :-
संत रविदास जी को मीरा बाई के आध्यात्मिक गुरु के रुप में माना जाता है जो कि राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी थी। वो संत रविदास के अध्यापन से बेहद प्रभावित थी और उनकी बहुत बड़ी अनुयायी बनी। अपने गुरु के सम्मान में मीरा बाई ने कुछ पंक्तियाँ लिखी है :-
“गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी,
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी”
संत रविदास के जीवन की कुछ महत्वपूर्णं घटनाएँ :-
एक बार गुरु जी के कुछ विद्यार्थी और अनुयायी ने पवित्र नदी गंगा में स्नान के लिये पूछा तो उन्होंने ये कह कर मना किया कि उन्होंने पहले से ही अपने एक ग्राहक को जूता देने का वादा कर दिया है तो अब वही उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। रविदास जी के एक विद्यार्थी ने उनसे दुबारा निवेदन किया तब उन्होंने कहा उनका मानना है कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा” मतलब शरीर को आत्मा से पवित्र होने की जरुरत है ना कि किसी पवित्र नदी में नहाने से, अगर हमारी आत्मा और ह्दय शुद्ध है तो हम पूरी तरह से पवित्र है चाहे हम घर में ही क्यों न नहाये।
सामाजिक मुद्दों में गुरु रविदास की सहभागिता :-
वास्तविक धर्म को बचाने के लिये रविदास जी को ईश्वर द्वारा धरती पर भेजा गया था क्योंकि उस समय सामाजिक और धार्मिक स्वरुप बेहद दु:खद था। क्योंकि इंसानों द्वारा ही इंसानों के लिये ही रंग, जाति, धर्म तथा सामाजिक मान्यताओं का भेदभाव किया जा चुका था। वो बहुत ही बहादुरी के साथ सभी भेदभाव को स्वीकार करते और लोगों को वास्तविक मान्यताओं और जाति के बारे में बताते। वो लोगों को सिखाते कि कोई भी अपने जाति या धर्म के लिये नहीं जाना जाता, इंसान अपने कर्म से पहचाना जाता है। गुरु रविदास जी समाज में अस्पृश्यता के खिलाफ भी लड़े जो उच्च जाति द्वारा निम्न जाति के लोगों के साथ किया जाता था।
उनके समय में निम्न जाति के लोगों की उपेक्षा होती थी, वो समाज में उच्च जाति के लोगों की तरह दिन में कहीं भी आ-जा नहीं सकते थे, उनके बच्चे स्कूलों में पढ़ नहीं सकते थे, मंदिरों में नहीं जा सकते थे, उन्हें पक्के मकान के बजाय सिर्फ झोपड़ियों में ही रहने की आजादी थी और भी ऐसे कई प्रतिबंध थे जो बिल्कुल अनुचित थे। इस तरह की सामाजिक समयस्याओं को देखकर गुरु जी ने निम्न जाति के लोगों की बुरी परिस्थिति को हमेशा के लिये दूर करने के लिये हर एक को आध्यात्मिक संदेश देना शुरु कर दिया।
उन्होंने लोगों को संदेश दिया कि “ईश्वर ने इंसान बनाया है ना कि इंसान ने ईश्वर बनाया है” अर्थात इस धरती पर सभी को भगवान ने बनाया है और सभी के अधिकार समान है। इस सामाजिक परिस्थिति के संदर्भ में, संत गुरु रविदास जी ने लोगों को वैश्विक भाईचारा और सहिष्णुता का ज्ञान दिया। गुरुजी के अध्यापन से प्रभावित होकर चितौड़ साम्राज्य के राजा और रानी उनके अनुयायी बन गये।
संत रविदास का सकारात्मक नज़रिया :-
उनके समय में शुद्रों (अस्पृश्य) को ब्राह्मणों की तरह जनेऊ, माथे पर तिलक और दूसरे धार्मिक संस्कारों की आजादी नहीं थी। संत रविदास एक महान व्यक्ति थे जो समाज में अस्पृश्यों के बराबरी के अधिकार के लिये उन सभी निषेधों के खिलाफ थे जो उन पर रोक लगाती थी। उन्होंने वो सभी क्रियाएँ जैसे जनेऊ धारण करना, धोती पहनना, तिलक लगाना आदि निम्न जाति के लोगों के साथ शुरु किया जो उन पर प्रतिबंधित था।
ब्राह्मण लोग उनकी इस बात से नाराज थे और समाज में अस्पृश्यों के लिये ऐसे कार्यों को जाँचने का प्रयास किया। हालाँकि गुरु रविदास जी ने हर बुरी परिस्थिति का बहादुरी के साथ सामना किया और बेहद विनम्रता से लोगों का जवाब दिया। अस्पृश्य होने के बावजूद भी जनेऊ पहनने के कारण ब्राह्मणों की शिकायत पर उन्हें राजा के दरबार में बुलाया गया। वहाँ उपस्थित होकर उन्होंने कहा कि अस्पृश्यों को भी समाज में बराबरी का अधिकार मिलना चाहिये क्योंकि उनके शरीर में भी दूसरों की तरह खून का रंग लाल और पवित्र आत्मा होती है
संत रविदास ने तुरंत अपनी छाती पर एक गहरी चोट की और उस पर चार युग जैसे सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग की तरह सोना, चाँदी, ताँबा और सूती के चार जनेऊ खींच दिया। राजा समेत सभी लोग अचंभित रह गये और गुरु जी के सम्मान में सभी उनके चरणों को छूने लगे। राजा को अपने बचपने जैसे व्यवहार पर बहुत शर्मिंदगी महसूस हुयी और उन्होंने इसके लिये माफी माँगी। गुरु जी ने सभी माफ करते हुए कहा कि जनेऊ धारण करने का ये मतलब नहीं कि कोई भगवान को प्राप्त कर लेता है। इस कार्य में वो केवल इसलिये शामिल हुए ताकि वो लोगों को वास्तविकता और सच्चाई बता सके। गुरु जी ने जनेऊ निकाला और राजा को दे दिया इसके बाद उन्होंने कभी जनेऊ और तिलक का इस्तेमाल नहीं किया।
गुरु रविदास जी के लिये स्मारक
वाराणसी में श्री गुरु रविदास पार्क :-
वाराणसी में श्री गुरु रविदास पार्क है जो नगवा में उनके यादगार के रुप में बनाया गया है जो उनके नाम पर “गुरु रविदास स्मारक और पार्क” बना है।
गुरु रविदास घाट :-
वाराणसी में पार्क से बिल्कुल सटा हुआ उनके नाम पर गंगा नदी के किनारे लागू करने के लिये गुरु रविदास घाट भी भारतीय सरकार द्वारा प्रस्तावित है।
संत रविदास नगर :-
ज्ञानपुर जिले के निकट संत रविदास नगर है जो कि पहले भदोही नाम से था अब उसका नाम भी संत रविदास नगर है।
श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर वाराणसी :-
इनके सम्मान में सीर गोवर्धनपुर, वाराणसी में श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर स्थित है, जो इनके सम्मान में बनाया गया है पूरी दुनिया में इनके अनुयायीयों द्वारा चलाया जाता है जो अब प्रधान धार्मिक कार्यालय के रुप में है।
श्री गुरु रविदास स्मारक गेट :-
वाराणसी के लंका चौराहे पर एक बड़ा गेट है जो इनके सम्मान में बनाया गया है।
इनके नाम पर देश के साथ ही विदेशों मे भी स्मारक बनाये गये है।
संत रविदास जयंती
पूरे भारत में खुशी और बड़े उत्साह के साथ माघ महीने के पूर्ण चन्द्रमा दिन पर माघ पूर्णिमा पर हर साल संत रविदास की जयंती या जन्म दिवस को मनाया जाता है। जबकि; वाराणसी में लोग इसे किसी उत्सव या त्योहार की तरह मनाते है।
2022 (645 वां) - 16 फरवरी, दिन- बुधवार
इस खास दिन पर आरती कार्यक्रम के दौरान मंत्रों के रागों के साथ लोगों द्वारा एक नगर कीर्तन जुलूस निकालने की प्रथा है जिसमें गीत-संगीत, गाना और दोहा आदि सड़कों पर बने मंदिरों में गाया जाता है। रविदास के अनुयायी और भक्त उनके जन्म दिवस पर गंगा- स्नान करने भी जाते है तथा घर या मंदिर में बनी छवि की पूजा-अर्चना करते है। इस पर्व को प्रतीक बनाने के लिये वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर के श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर के बेहद प्रसिद्ध स्थान पर हर साल वाराणसी में लोगों के द्वारा इसे बेहद भव्य तरीके से मनाया जाता है। संत रविदास के भक्त और दूसरे अन्य लोग पूरे विश्व से इस उत्सव में सक्रिय रुप से भाग लेने के लिये वाराणसी आते है।
दोहे :-
करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस,
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास.
रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच.
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास
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