गणेश पुराण का महत्त्व
किसी भी पूजा-अर्चना या शुभ कार्य को सम्पन्न कराने से पूर्व गणेश जी की
आराधना की जाती है। यह गणेश पुराण अति पूजनीय है।
इसके पठन-पाठन से सब कार्य सफल हो जाते हैं। इस खंड में ऐसी कथाएं सूत जी ने
सुनाई हैं जिससे हमेशा सब जगह मंगल ही होगा। सूत जी ने सबसे पहली कथा द्वारा बताया
है कि किस प्रकार प्रजाओं की सृष्टि हुई और सर्वश्रेष्ठ देव भगवान् गणेश का
आविर्भाव किस प्रकार हुआ।
आगे सूत जी ने शिव के अनेक रूपों का वर्णन किया है। वे कैसे सृष्टि की
उत्पत्ति, संहार और पालन करते हैं। साथ ही यह भी बताया
गया है कि विष्णु का एक वर्ष शिव के एक दिन के बराबर होता है। साथ ही सती की कथा
है जिसका विवाह शिवजी से हुआ।
दूसरा खण्ड परिचय खण्ड है
जिसमें गणेश जन्म कथाओं का परिचय दिया गया है। इसमें अलग-अलग पुराणों के
अनुसार कथा कही गई है। जैसे पद्म व लिंग पुराण के अनुसार। और अंत में गणेश की
उत्पत्ति की सविस्तार से उत्पत्ति की कथा है।
तीसरा खण्ड माता पार्वती खण्ड है
इसमें पार्वती के पर्वतराज हिमालय के घर जन्म की कथा है और शिव से विवाह की
कथा। आगे कार्तिकेय के जन्म की कथा है जिसमें तारकासुर के अत्याचार से लेकर
कार्तिकेय के जन्म की कथा है। इस खण्ड में वशिष्ठ जी द्वारा सुनाई अरण्यराज की कथा
है।
चौथा खण्ड युद्ध खण्ड : नाम खण्ड है
इसमें आरम्भ में मत्सर नामक असुर के जन्म की कथा है जिसने दैत्य गुरु
शुक्राचार्य से शिव पंचाक्षरी मन्त्र की दीक्षा ली। आगे तारक नामक असुर की कथा है।
उसने ब्रह्मा की अराधना कर त्रैलोक्य का स्वामित्व प्राप्त किया। साथ में इसमें
महोदर व महासुर के आपसी युद्ध की कथा है। लोभासुर व गजानन की कथा भी है जिसमें
लोभासुर ने गजानन के मूल महत्त्व को समझा और उनके चरणों की वंदना करने लगा। इसी
तरह आगे क्रोधासुर व लम्बोदर की कथा है। आगे फिर कामासुर, विघ्नराज,
धूम्रवर्ण की
कथा कही गई है।
पांचवा खण्ड महादेव पुण्य कथा खण्ड है
इसमें सूत जी ने ऋषियों को कहा,
आप कृपा करके
गणेश, पार्वती के युगों का परिचय दीजिए। तब आगे इस
खण्ड में सत्तयुग, त्रेतायुग व द्वापर युग के बारे में बताया
है। जन्मासुर, तारकासुर की कथा से इसका अन्त हुआ है।
आरम्भ खण्ड
बहुत प्राचीन समय की बात है कि एक बार नैमिषारण्य में कथाकार सूतजी पधारे।
उन्हें आया देखकर वहां रहने वाले ऋषि मुनियों ने उनका अभिवादन किया। अभिवादन के
बाद सभी ऋषि-मुनि अपने-अपने आसन पर बैठ गए तब उन्हीं में से किसी एक ने सूतजी से
कहा-‘‘हे सूत जी ! आप लोक और लोकोत्तर के
ज्ञान-ध्यान से परिपूर्ण कथा वाचन में सिद्धहस्त हैं। हमारा आप से निवेदन है कि आप
हमें हमारा मंगल करने वाली कथाएँ सुनायें।’’
ऋषि-मुनियों से आदर पाकर सूतजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-‘‘आपने जो मुझे आदर दिया है वह सराहनीय है। मैं
यहां आप लोगों को परम कल्याणकारी कथा सुनाऊंगा।’’
सूतजी की बात सुनकर ऋषि बोले-‘‘आप हमें
कौन-सी कथा सुनायेंगे ?’’
यह सुनकर सूतजी ने कहा-‘‘बह्मा, विष्णु,
महेश, ब्रह्म के तीन रूप हैं। मैं स्वयं उनकी शरण
में रहता हूं। यद्यपि विष्णु संसार पालक हैं और वह ब्रह्मा की उत्पन्न की गयी
सृष्टि का पालन करते हैं। ब्रह्मा ने ही सुर-असुर,
प्रजापति तथा
अन्य यौनिज और अयौनिज सृष्टि की रचना की है। रुद्र अपने सम्पूर्ण कल्याणकारी कृत्य
से सृष्टि के परिवर्तन का आधार प्रस्तुत करते हैं। पहले तो मैं तुम्हें बताऊंगा कि
किस प्रकार प्रजाओं की सृष्टि हुई और फिर उनमें सर्वश्रेष्ठ देव भगवान् गणेश का
आविर्भाव कैसे हुआ।
भगवान् ब्रह्मा ने जब सबसे पहले सृष्टि की रचना की तो उनकी प्रजा नियमानुसार
पथ में प्रवृत्ति नहीं हुई। वह सब अलिप्त रह गए। इस कारण ब्रह्मा ने सबसे पहले
तामसी सृष्टि की, फिर राजसी। फिर भी इच्छित फल प्राप्त नहीं
हुआ। जब रजोगुण ने तमोगुण को ढक लिया तो उससे एक मिथुन की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा
के चरण से अधर्म और शोक से इन्सान ने जन्म लिया। ब्रह्मा ने उस मलिन देह को दो
भागों में विभक्त कर दिया। एक पुरुष और एक स्त्री। स्त्री का नाम सतरूपा हुआ। उसने
स्वयंभू मनु का पति के रूप में वरण किया और उसके साथ रमण करने लगी।
रमण करने के कारण ही उसका नाम रति हुआ। फिर ब्रह्मा ने विराट का सृजन किया। तब
विराट से वैराज मनु की उत्पत्ति हुई। फिर वैराज मनु और सतरूपा से प्रियव्रत और
उत्तानुपात दो पुत्र उत्पन्न हुए और आपूति तथा प्रसूति नाम की दो पुत्रियां हुईं।
इन्हीं दो पुत्रियों से सारी प्रजा उत्पन्न हुई। मनु ने प्रसूति को दक्ष के
हाथ में सौंप दिया। जो प्राण है, वह दक्ष है और
जो संकल्प है, वह मनु है। मनु ने रुचि प्रजापति को आपूति
नाम की कन्या भेंट की। फिर इनसे यज्ञ और दक्षिणा नाम की सन्तान हुई। दक्षिणा से
बारह पुत्र हुए, जिन्हें याम कहा गया। इनमें श्रद्धा, लक्ष्मी आदि मुख्य हैं। इनसे फिर यह विश्व
आगे विकास को प्राप्त हुआ।
अधर्म को हिंसा के गर्भ से निर्कति उत्पन्न हुई और अन्निद्ध नाम का पुत्र
उत्पन्न हुआ। फिर इसके बाद यह वंश क्रम बढ़ता गया। कुछ समय बाद नीलरोहित, निरुप,
प्रजाओं की
उत्पत्ति हुई और उन्हें रुद्र नाम से प्रतिष्ठित किया गया। रुद्र ने पहले ही बता
दिया था कि यह सब शतरुद्र नाम से विख्यात होंगे। यह सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हुए
और फिर इसके बाद उन्होंने पृथ्वी पर मैथुनी सृष्टि का प्रारम्भ करके शेष प्रजा की
सृष्टि बन्द कर दी।
सूतजी की बातें सुनकर ऋषि-मुनियों ने कहा,
‘‘आपने हमें जो
बताया है उससे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। आप कृपा करके हमें हमारे पूजनीय देव के
विषय में बताइये। जो देवता हमें पूज्य हो और उसकी कृपा से हमारे और आगे आने वाली
प्रजाओं के कल्याणकारी कार्य सम्पन्न हों।’’
ऋषियों की बात
सुनकर सूतजी ने कहा कि ऐसा देव तो केवल एक ही है और वह है महादेव और पार्वती के
पुत्र श्री गणेश।
गणेश का नाम सुनते ही ऋषि मुनि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने सूतजी ने निवेदन
किया कि ‘‘आप हमें गणेशजी के विषय में पर्याप्त विस्तार
से बताइये क्योंकि अभी तक आपने जो कुछ भी बताया है,
उससे पता चलता
है कि महादेव पुत्र गणेशजी के जन्म के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं।’’
सूतजी अपने आसन पर बहुत ध्यानपूर्वक बैठ गए,
क्षणभर
उन्होंने कुछ सोचा और फिर कहना प्रारम्भ किया-‘‘गणेशजी देवों
में देव श्रेष्ठ देव हैं, जो भी कार्य उनको नमन करके प्रारम्भ किया
जाता है, वह सफलता प्राप्त करता है।’’
सूतजी ने बताया, ‘‘जो ऋषि-मुनि,
मनुष्य, पृथ्वी का वासी ‘गणेशाय नमः’
का पाठ करके
अपना कार्य प्रारम्भ करता है, उसे निश्चित
ही अपने कार्य में सफलता मिलती है।’’
मुनियों ने सूतजी से कहा, ‘‘पहले तो आप
कृपा करके हमें भिन्न रुपों से गणेशजी के जन्मों को वृत्तांत सुनाइये वे तो
महाप्रभु हैं उनके जन्म को विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रुपों से गाया गया है, और हे सूतजी ! हम सृष्टि की आदि व्यस्था के
विषय में भी जानना चाहते हैं।’’
सूतजी ने मुनियों की जिज्ञासा जानकर कहा,
‘‘पहले मैं आपको
शिव और गणेश के चरित्र वर्णन से लाभ देकर यह बताऊंगा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवान् रुद्र के अंश से रचे
गए हैं।’’
ऋषिगण बोले, ‘‘कृपया यह बताएं कि शिव और गणेश का
सर्वश्रेष्ठ रूप व चरित्र क्या है ?
शिवजी के
पुत्र को कैसे प्रसन्न किया जा सकता है ?
जैसा कि आपने
कहा-ब्रह्मा, विष्णु और महेश, भगवान रुद्र के अंश से उत्पन्न हुए। पर फिर
भी महेश ही पूर्णांश के रूप में माने जाते हैं।’’
सूतजी ने कहा, ‘‘एक बार नारदजी ने भी ब्रह्माजी से ऐसा ही
प्रश्न किया था। ब्रह्माजी ने संसार की रचना,
उत्पत्ति और
स्वरूप का वर्णन नारदजी से इस प्रकार किया-
‘‘सृष्टि की प्रारम्भिक अवस्था में जब प्रलय
हुई और उस विनाश काल में स्थावर-जंगम,
सूर्य, ग्रह तारे सब नष्ट हो गए तो केवल एक
सद्ब्रह्म ही शेष बचे थे। उस अंधकार के साम्राज्य में सद्ब्रह्म ही मन, वाणी और इन्द्रियों के ज्ञान के प्रकाश से
भरे हुए थे। जो योग द्वारा ध्यानगम्य थे। वे नाम,
रूप वर्ण, सत्-असत् और अन्य कर्मों से परे थे।
भगवान श्रीगणेश के स्वरूप का
ध्यान करने से
ही सारे विघ्नों का अंत हो जाता
है। इसीलिए उन्हें विघ्न विनाशक कहा
जाता है।
हिन्दू धर्मग्रन्थों में भगवान श्रीगणेश के स्वरूप की कई स्थानों पर अति सुंदर व्याख्या की गई है। इन व्याख्याओं में बताया गया है कि श्री गणेश और
उनके स्वरूप में कौन कौन सी विशेष
बातें हैं,जिन्हें मनुष्यों को अपनाना चाहिए। श्री गणेश जी के पावन स्वरूप की कुछ बिशेष बातें;-
विशेष है गज मस्तक;-
भगवान श्रीगणेश गजानन हैं।
अर्थात जिनका
मुख गज अर्थात हाथी के सदृश है। श्री गणेश के बड़े सिर से यह शिक्षा
मिलती है कि व्यक्ति को हमेशा बड़ा
सोचना चाहिए। तभी उसके कर्म भी बड़े होंगे। गजमुख स्वरूप में बड़े कानों का भी बड़ा महत्व है। भगवान श्रीगणेश के बड़े कानों से यह सीख मिलती है कि व्यक्ति को सदा ही हरेक बात को ध्यान से सुनना चाहिए। ध्यान से सुनी
गई हर बात पर अमल करना और उसे समझना आसान हो जाता है।
चेहरे की तुलना में छोटी छोटी आंखें
लक्ष्य में
पैनी नजर और एकाग्रता का प्रतीक हैं। भगवान श्रीगणेश जिन वस्तुओं को धारण करते हैं वे सभी विशेष हैं।
भगवान श्री गणेश का स्वरूप
चार भुजाधारी
है,अर्थात उनके चार हाथ हैं। इन चार हाथों में एक में कुल्हाड़ी है,
दूसरे में रस्सी है तीसरे में मोदक हैं और चौथा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। कुल्हाड़ी का अर्थ सभी बंधनों को
काटने की ओर इंगित करता है।
रस्सी का अर्थ
है कि अपनों को करीब रखें,ताकि सबसे
मुश्किल लक्ष्य प्राप्त करने में सुगमता हो।
मोदक साधना का फल है,जिसका
अर्थ परिश्रम
से पाई सफलता है। चौथा हाथ भक्तों की ओर आशीर्वाद स्वरूप है,जो लक्ष्य की
ओर आगे बढ़ने का आशीर्वाद देता है।
एकदंत हैं गणेश,विशेष है सूंड;-
भगवान श्री
गणेश के गज स्वरूप में
सूंड का अर्थ है कि क्षमता और किसी
को अपनाने की
इच्छाशक्ति मनुष्य में होनी चाहिए। जिनमें ये गुण नहीं होते,वे मनुष्य अपने लक्ष्यों से भटक जाते हैं और उन्हें प्राप्त करने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। वहीं एकदंत का बहुत सीधा सा अर्थ है कि व्यक्ति को हमेशा अच्छे गुणों को अपने पास रखना चाहिए और अनावश्यक व दुर्गुणों को
खुद से दूर कर देना चाहिए।
भगवान श्री
गणेश का बड़ा पेट शांतिमय जीवन में अच्छे और बुरे अनुभवों को उदरस्थ करने का संकेत है।
श्री गणेश की प्रतिमा या चित्रों
में मूषक
अवश्य रूप से होता है। मूषक श्री
गणेश का वाहन है और श्री गणेश के स्वरूप में अवश्य दिखाई देता है। मूषक का तात्पर्य एक सच्चे सेवक से है। एक ऐसा वाहन जिस पर आप हावी रहें,न कि
वाहक(वाहन) आप पर हावी हो जाए।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय,
लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय,
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते।।
भक्तार्तिनाशनपराय गनेशाश्वराय,
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय।
विद्याधराय विकटाय च वामनाय,
भक्त प्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते।।
भगवान गणेश का कैसा है परिवार, जानिए
भगवान गणेश शिव परिवार में ज्येष्ठ पुत्र हैं। शिव परिवार के प्रत्येक व्यक्ति
या उनसे जुड़े वाहन एक- दूसरे से विपरीत होने के बावजूद प्रेम के धागे से बंधे
हैं। जैसे शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है,
मगर शिवजी के
गले में सर्प लटके रहते हैं। वैसे स्वभाव से मयूर और सर्प दुश्मन हैं।
इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप
मूषकभक्षी जीव है। पार्वती स्वयं शक्ति हैं,
जगदम्बा हैं
जिनका वाहन शेर है। मगर शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। परंतु नहीं, इन भिन्नताओं,
शत्रुताओं और
ऊंचे-नीचे स्तरों के बावजूद शिव का परिवार शांति के साथ कैलाश पर्वत पर
प्रसन्नतापूर्वक रहता है।
स्वभावों की विपरीतताओं, विसंगतियों और
असहमतियों के बावजूद सब कुछ सुगम है,
क्योंकि
परिवार के मुखिया ने सारा विष तो अपने गले में थाम रखा है। विसंगतियों के बीच
संतुलन का बढ़िया उदाहरण है शिव का परिवार। इसी तरह भगवान गणेश का परिवार भी सुख और
समृद्ध से परिपूर्ण है।
आइए जानते हैं गणेशजी का संपूर्ण परिचय...
* गणेश जन्म कथा : अलग-अलग पुराणों में गणेशजी
की जन्म कथा अलग-अलग है, लेकिन सर्वमान्यता के अनुसार गणेशजी को
पार्वतीजी ने एक दुर्वा से बनाकर अपने पहरे के लिए रखा था। कथा के अनुसार गणेश को
द्वार पर बिठाकर पार्वती स्नान करने लगीं। इतने में शिव आए और पार्वती के भवन में
प्रवेश करने लगे। गणेश ने जब उन्हें रोका तो क्रुद्ध शिव ने उसका सिर काट दिया। इस
घटना से पार्वतीजी क्रोधित हो गईं,
तब शिवजी ने
एक हाथी का सिर उन पर लगाकर उन्हें फिर से जीवित कर दिया।
* गणेशजी के भाई : श्रीकार्तिकेय (बड़े भाई)।
हालांकि उनके और भी भाई हैं जैसे सुकेश,
जलंधर, अयप्पा और भूमा।
* गणेशजी की बहन : अशोक सुंदरी। हालांकि महादेव
की और भी पुत्रियां थीं जिन्हें नागकन्या माना गया- जया, विषहर,
शामिलबारी, देव और दोतलि। अशोक सुंदरी को भगवान शिव और
पार्वती की पुत्री बताया गया इसीलिए वही गणेशजी की बहन है। इसका विवाह राजा नहुष
से हुआ था।
* गणेशजी की पत्नियां : गणेशजी की दो पत्नियां
हैं : ऋद्धि, सिद्धि,
बहुएं तुष्टि, पुष्टि और श्री।
* गणेशजी के पुत्र : पुत्र लाभ और शुभ तथा पोते
आमोद और प्रमोद।
* अधिपति : जल तत्व के अधिपति।
* प्रिय पुष्प : लाल रंग के फूल।
* प्रिय वस्तु : दुर्वा (दूब), शमी-पत्र।
* प्रमुख अस्त्र : पाश और अंकुश।
* गणेश वाहन : सिंह, मयूर और मूषक। सतयुग में सिंह, त्रेतायुग में मयूर, द्वापर युग में मूषक और कलियुग में घोड़ा है।
* गणेशजी का जप मंत्र : ॐ गं गणपतये नम: है।
* गणेशजी की पसंद : गणेशजी को बेसन और मोदक के
लड्डू पसंद हैं।
* गणेशजी की प्रार्थना के लिए : गणेश स्तुति, गणेश चालीसा,
गणेशजी की
आरती, श्रीगणेश सहस्रनामावली आदि।
* गणेशजी के 12
प्रमुख नाम :
सुमुख, एकदंत,
कपिल, गजकर्णक,
लंबोदर, विकट,
विघ्न-नाश, विनायक,
धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष,
भालचंद्र, गजानन।
अष्टविनायक
गणेश जी के आठ अति
प्राचीन मंदिर, जहाँ है स्वयंभू गणेश जी अष्टविनायक से अभिप्राय है- "आठ
गणपति"। यह आठ अति प्राचीन मंदिर भगवान गणेश के आठ शक्तिपीठ भी कहलाते है जो
की महाराष्ट्र में स्तिथ हैं।महाराष्ट्र में पुणे के समीप अष्टविनायक के आठ पवित्र
मंदिर 20 से 110
किलोमीटर के
क्षेत्र में स्थित हैं। इन मंदिरों का पौराणिक महत्व और इतिहास है। इनमें विराजित
गणेश की प्रतिमाएँ स्वयंभू मानी जाती हैं,
यानि यह स्वयं
प्रगट हुई हैं। यह मानव निर्मित न होकर प्राकृतिक हैं। 'अष्टविनायक'
के ये सभी आठ
मंदिर अत्यंत पुराने और प्राचीन हैं। इन सभी का विशेष उल्लेख गणेश और मुद्गल पुराण, जो हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों का समूह
हैं, में किया गया है। इन आठ गणपति धामों की यात्रा अष्टविनायक
तीर्थ यात्रा के नाम से जानी जाती है। इन पवित्र प्रतिमाओं के प्राप्त होने के
क्रम के अनुसार ही अष्टविनायक की यात्रा भी की जाती है। अष्टविनायक दर्शन की
शास्त्रोक्त क्रमबद्धता इस प्रकार है-
मयूरेश्वर या मोरेश्वर - मोरगाँव,
पुणे
सिद्धिविनायक - करजत तहसील, अहमदनगर
बल्लालेश्वर - पाली गाँव, रायगढ़
वरदविनायक - कोल्हापुर, रायगढ़
चिंतामणी - थेऊर गाँव, पुणे
गिरिजात्मज अष्टविनायक - लेण्याद्री गाँव,
पुणे
विघ्नेश्वर अष्टविनायक - ओझर
महागणपति - राजणगाँव
1- श्री मयूरेश्वर मंदिर ( Moreshwar Temple) :
यह मंदिर पुणे से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मोरेगांव गणेशजी की
पूजा का महत्वपूर्ण केंद्र है। मयूरेश्वर मंदिर के चारों कोनों में मीनारें हैं और
लंबे पत्थरों की दीवारें हैं। यहां चार द्वार हैं। ये चारों दरवाजे चारों युग, सतयुग,
त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के प्रतीक हैं।
इस मंदिर के द्वार पर शिवजी के वाहन नंदी बैल की मूर्ति स्थापित है, इसका मुंह भगवान गणेश की मूर्ति की ओर है।
नंदी की मूर्ति के संबंध में यहां प्रचलित मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में
शिवजी और नंदी इस मंदिर क्षेत्र में विश्राम के लिए रुके थे, लेकिन बाद में नंदी ने यहां से जाने के लिए
मना कर दिया। तभी से नंदी यहीं स्थित है। नंदी और मूषक, दोनों ही मंदिर के रक्षक के रूप में तैनात
हैं। मंदिर में गणेशजी बैठी मुद्रा में विराजमान है तथा उनकी सूंड बाएं हाथ की ओर
है तथा उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं।
मान्यताओं के
अनुसार मयूरेश्वर के मंदिर में भगवान गणेश
द्वारा सिंधुरासुर नामक एक राक्षस का वध किया गया था। गणेशजी ने मोर पर सवार होकर
सिंधुरासुर से युद्ध किया था। इसी कारण यहां स्थित गणेशजी को मयूरेश्वर कहा जाता
है।
2- सिद्धिविनायक मंदिर (Siddhivinayak Temple) :
अष्ट विनायक में दूसरे गणेश हैं सिद्धिविनायक। यह मंदिर पुणे से करीब 200 किमी दूरी पर स्थित है। समीप ही भीम नदी है।
यह क्षेत्र सिद्धटेक गावं के अंतर्गत आता है। यह पुणे के सबसे पुराने मंदिरों में
से एक है। मंदिर करीब 200 साल पुराना है। सिद्धटेक में सिद्धिविनायक
मंदिर बहुत ही सिद्ध स्थान है। ऐसा माना जाता है यहां भगवान विष्णु ने सिद्धियां
हासिल की थी। सिद्धिविनायक मंदिर एक पहाड़ की चोटी पर बना हुआ है। जिसका मुख्य
द्वार उत्तर दिशा की ओर है। मंदिर की परिक्रमा के लिए पहाड़ी की यात्रा करनी होती
है। यहां गणेशजी की मूर्ति 3 फीट ऊंची और
ढाई फीट चैड़ी है। मूर्ति का मुख उत्तर दिशा की ओर है। भगवान गणेश की सूंड सीधे
हाथ की ओर है।
3- श्री बल्लालेश्वर मंदिर (Ballaleshwar Temple) :
अष्टविनायक में अगला मंदिर है श्री बल्लालेश्वर मंदिर। यह मंदिर मुंबई-पुणे
हाइवे पर पाली से टोयन में और गोवा राजमार्ग पर नागोथाने से पहले 11 किलोमीटर दूर स्थित है। इस मंदिर का नाम
गणेशजी के भक्त बल्लाल के नाम पर पड़ा है। प्राचीन काल में बल्लाल नाम का एक लड़का था,
वह गणेशजी का
परमभक्त था। एक दिन उसने पाली गांव में विशेष पूजा का आयोजन किया। पूजन कई दिनों
तक चल रहा था, पूजा में शामिल कई बच्चे घर लौटकर नहीं गए और
वहीं बैठे रहे। इस कारण उन बच्चों के माता-पिता ने बल्लाल को पीटा और गणेशजी की
प्रतिमा के साथ उसे भी जंगल में फेंक दिया। गंभीर हालत में बल्लाल गणेशजी के
मंत्रों का जप कर रहा था। इस भक्ति से प्रसन्न होकर गणेशजी ने उसे दर्शन दिए। तब
बल्लाल ने गणेशजी से आग्रह किया अब वे इसी स्थान पर निवास करें। गणपति ने आग्रह
मान लिया।
4- श्री वरदविनायक (Varadavinayak Temple) :
अष्ट विनायक में चौथे गणेश हैं श्री वरदविनायक। यह मंदिर महाराष्ट्र के रायगढ़
जिले के कोल्हापुर क्षेत्र में स्थित है। यहां एक सुन्दर पर्वतीय गांव है महाड़।
इसी गांव में श्री वरदविनायक मंदिर। यहां प्रचलित मान्यता के अनुसार वरदविनायक
भक्तों की सभी कामनों को पूरा होने का वरदान प्रदान करते हैं।
इस मंदिर में नंददीप नाम का एक दीपक है जो कई वर्षों में प्रज्जवलित है।
वरदविनायक का नाम लेने मात्र से ही सारी कामनाओं को पूरा होने का वरदान प्राप्त
होता है।
5- चिंतामणि गणपति (Chintamani Temple) :
अष्टविनायक में पांचवें गणेश हैं चिंतामणि गणपति। यह मंदिर पुणे जिले के हवेली
क्षेत्र में स्थित है। मंदिर के पास ही तीन नदियों का संगम है। ये तीन नदियां हैं
भीम, मुला और मुथा। यदि किसी भक्त का मन बहुत
विचलित है और जीवन में दुख ही दुख प्राप्त हो रहे हैं तो इस मंदिर में आने पर ये
सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि स्वयं भगवान ब्रहमा ने अपने
विचलित मन को वश में करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी।
6- श्री गिरजात्मज गणपति (Girijatmaj Temple) :
अष्टविनायक में अगले गणपति हैं श्री गिरजात्मज। यह मंदिर पुणे-नासिक राजमार्ग
पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। क्षेत्र के
नारायणगांव से इस मंदिर की दूरी 12 किलोमीटर है।
गिरजात्मज का अर्थ है गिरिजा यानी माता पार्वती के पुत्र गणेश। यह मंदिर एक पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के स्थान
पर बनाया गया है। यहां लेनयादरी पहाड़ पर 18
बौद्ध गुफाएं
हैं और इनमें से 8वीं गुफा में गिरजात्मज विनायक मंदिर है। इन
गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए
करीब 300 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। यह पूरा मंदिर ही
एक बड़े पत्थर को काटकर बनाया गया है।
7- विघ्नेश्वर गणपति मंदिर (Vighnahar Temple) :
अष्टविनायक में सातवें गणेश हैं विघ्नेश्वर गणपति। यह मंदिर पुणे के ओझर जिले
में जूनर क्षेत्र में स्थित है। यह पुणे-नासिक रोड पर नारायणगावं से जूनर या ओजर
होकर करीब 85 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
प्रचलित कथा के अनुसार विघनासुर नामक एक असुर था जो संतों को प्रताणित कर रहा
था। भगवान गणेश ने इसी क्षेत्र में उस असुर का वध किया और सभी को कष्टों से मुक्ति
दिलवाई। तभी से यह मंदिर विघ्नेश्वर,
विघ्नहर्ता और
विघ्नहार के रूप में जाना जाता है।
8- महागणपति मंदिर (Mahaganapati Temple) :
अष्टविनायक मंदिर के आठवें गणेशजी हैं महागणपति। मंदिर पुणे के रांजणगांव में
स्थित है। यह पुणे-अहमदनगर राजमार्ग पर 50
किलोमीटर की
दूरी पर स्थित है । इस मंदिर का इतिहास 9-10वीं सदी के
बीच माना जाता है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर है जो कि बहुत विशाल और
सुन्दर है। भगवान गणपति की मूर्ति को माहोतक नाम से भी जाना जाता है। यहां की
गणेशजी प्रतिमा अद्भुत है। प्रचलित मान्यता के अनुसार मंदिर की मूल मूर्ति तहखाने
की छिपी हुई है। पुराने समय में जब विदेशियों ने यहां आक्रमण किया था तो उनसे
मूर्ति बचाने के लिए उसे तहखाने में छिपा दिया गया
था।
गणेश और सवारी मूषक की कहानी
बहुत समय की बात है, एक बहुत ही भयंकर असुरों का राजा था – गजमुख। वह बहुत ही शक्तिशाली बनना और धन
चाहता था। वह साथ ही सभी देवी-देवताओं को अपने वश में करना चाहता था इसलिए हमेशा
भगवान शिव से वरदान के लिए तपस्या करता था। शिव जी से वरदान पाने के लिए वह अपना
राज्य छोड़ कर जंगल में जा कर रहने लगा और शिवजी से वरदान प्राप्त करने के लिए, बिना पानी पिए भोजन खाए रातदिन तपस्या करने
लगा।
कुछ साल बीत गए, शिवजी उसके अपार तप को देखकर प्रभावित हो गए
और शिवजी उसके सामने प्रकट हुए। शिवजी नें खुश हो कर उसे दैविक शक्तियाँ प्रदान
किया जिससे वह बहुत शक्तिशाली बन गया। सबसे बड़ी ताकत जो शिवजी नें उसे प्रदान किया
वह यह था की उसे किसी भी शस्त्र से नहीं मारा जा सकता। असुर गजमुख को अपनी
शक्तियों पर गर्व हो गया और वह अपने शक्तियों का दुर्पयोग करने लगा और
देवी-देवताओं पर आक्रमण करने लगा।
मात्र शिव, विष्णु,
ब्रह्मा और
गणेश ही उसके आतंक से बचे हुए थे। गजमुख चाहता था की हर कोई देवता उसकी पूजा करे।
सभी देवता शिव, विष्णु और ब्रह्मा जी के शरण में पहुंचे और
अपनी जीवन की रक्षा के लिए गुहार करने लगे। यह सब देख कर शिवजी नें गणेश को असुर
गजमुख को यह सब करने से रोकने के लिए भेजा।
गणेश जी नें गजमुख के साथ युद्ध किया और असुर गजमुख को बुरी तरह से घायल कर दिया। लेकिन तब भी वह नहीं माना। उस राक्षक नें स्वयं को एक मूषक के रूप में बदल लिया और गणेश जी की और आक्रमण करने के लिए दौड़ा। जैसे ही वह गणेश जी के पास पहुंचा गणेश जी कूद कर उसके ऊपर बैठ गए और गणेश जी ने गजमुख को जीवन भर के मुस में बदल दिया और अपने वाहन के रूप में जीवन भर के लिए रख लिया। बाद में गजमुख भी अपने इस रूप से खुश हुआ और गणेश जी का प्रिय मित्र भी बन गया।

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