भारत का आखिरी अश्वमेघ यज्ञ
हम बात करेंगे.. अश्वमेघ यज्ञ की, वो अश्वमेघ यज्ञ जो कलयुग में कराया गया था, वो भी आज से लगभग 300 वर्ष पहले.
हम सभी ने रामायण में देखा कि प्रभु श्री राम जी अयोध्या में अश्वमेघ यज्ञ कराते हैं.
अश्वमेघ यज्ञ सनातनी परम्परा में सबसे बड़ा अनुष्ठान माना जाता था, जिसमे लाखो, लोगों का सम्मलित होना होता था, ये अनुष्ठान कई महीनों या वर्षो तक भी चलता था , इस यज्ञ को कराने में अच्छा खासा खर्चा हुआ करता था, लाखो- करोड़ो लोगों को भोजन व दान दिया जाता था,खासकर भारत के कोने कोने से आये ब्राह्मणों को दान व सेवा दी जाती थी, जिससे उस राजवंश की कीर्ति चारों दिशा में फैल सके.
आश्वलायन श्रौत सूत्र (10। 6। 1) का कथन है कि जो सब पदार्थो को प्राप्त करना चाहता है, सब विजयों का इच्छुक होता है और समस्त समृद्धि पाने की कामना करता है वह इस यज्ञ का अधिकारी है। इसलिए सार्वीभौम के अतिरिक्त भी मूर्धाभिषिक्त राजा अश्वमेध कर सकता था.
प्राचीन भारत मे समय समय पर कई क्षत्रिय राजवंशो ने सम्पूर्ण विधि से अश्वमेघ कराए हैं, पर क्या आप जानते है,भारत का आखिरी सम्पूर्ण अश्वमेघ यज्ञ कब और कहाँ हुआ था.
इस परम्परा के पोषक सबसे अंतिम राजा #जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह हुए हैं, जिनके द्वारा किये अश्वमेध यज्ञ का वर्णन श्री कृष्ण भट्ट कविकलानिधि ने "ईश्वरविलास महाकाव्य" में तथा महानन्द पाठक ने अपनी "अश्वमेधपद्धति" में (जो किसी राजेन्द्र वर्मा की आज्ञा से संकलित अपने विषय की अत्यंत विस्तृत पुस्तक है) में किया है।
आइये हम आपको बताते हैं, की इस कलयुग का आखिरी अश्वमेघ यज्ञ आज से करीब 300 वर्ष पहले,जयपुर राजवंश ने कराया था, जयपुर को छोटी काशी भी जाता था, सौभाग्य से जयपुर राजवँश सूर्यवंशी कुल है, व प्रभु श्री राम के बड़े पुत्र कुश के वंशज भी हैं, जिन्हें कछवाह राजवँश कहा जाता है
इसी वंश के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1734 ई० में विशाल व सम्पूर्ण अश्वमेघ यज्ञ कराया था.
इतिहासकार बताते हैं, इस समय इस वैदिक अनुष्ठान के सिर्फ दान-पुण्य में करीब 33 करोड़ रुपये का खर्च आया था.. सवाई जयसिंह ने इससे पहले इस धरा पर, राजसूर्य यज्ञ, बाजपेय आदि यज्ञों का भी अनुष्ठान कराया था.
कहा जाता है, जयपुर का ये अश्वमेघ यज्ञ करीब 700 वर्ष के बाद भारत मे किया गया था.
इससे पहले इस अश्वमेघ यज्ञ के बाद जयपुर की जनता ने, सवाई जय सिंह जी को धर्मराज युधिष्ठिर की उपाधि दी थी. इस यज्ञ की तैयारी के लिये जयपुर को 5 वर्ष पहले से ही तैयारी करनी पड़ी थी, और ये यज्ञ करीब 14 महीने तक चला था.
ढोल नगाड़ों से ढूंढाड़ राज्य में सूचना दी कि आमेर नरेश विष्णुसिंह के पुत्र जयसिंह द्वितीय अश्वमेध करवा रहे हैं।
आए विद्वानों को ब्रह्मपुरी में हवेली, कुआं और गाय भेंटकर बसाया गया।
यज्ञ मंडपों को ढका गया चांदी-सोने के पत्तरों से सोमयज्ञ विद्वान व्यास शर्मा, वेद ज्ञाता उपाध्याय रामचन्द्र द्रविड़, पंडित यज्ञकर, कंठस्थ वेद ज्ञाता पंडित गुणकर, कर्नाटक के हरिकृष्ण शर्मा आदि विद्वान आए थे। जयसिंह ने स्वर्ण व रत्नों की ढेरियां लगाने के साथ यज्ञ सामग्री एकत्र करवाई। यज्ञ मंडपों को चांदी-सोने के पत्तरों से ढका गया। पूर्णाहुति के बाद करीब 300 पशु-पक्षियों को आजाद किया।
यज्ञ से पहले परशुरामद्वारा, काला हनुमानजी, शाहपुरा बाग, काला महादेवजी व यज्ञशाला की बावडिय़ां बनाई गई। दक्षिण के कांचीपुरम से हीदा मीणा बिरदराज विष्णु मूर्ति को लाया, जिसे प्रथम पुरुष मान डूंगरी पर स्थापित किया। काशी विद्वान यज्ञकर को यजुर्वेद का प्रतीक माना।
जयसिंह ने अपनी राणियों में सिसोदनीजी, राठौड़ीजी, सौलंकीनीजी, जादूनजी व चन्द्रावतजी के साथ तीर्थों का पवित्र जल मिले जलमहल में स्नान किया।
महाराजा ने तीन करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकल्प किया और गुरु रत्नाकर पौंडरिक व जगन्नाथ सम्राट को हवेलियां, बाग आदि जागीरें दी।
मथुरा में चांदी का तुला दान
जयसिंह ने कुरुक्षेत्र में सप्त स्वर्ण सागर और काशी में हाथी घोड़े दान किए। मथुरा में चांदी का तुला दान कर करीब 33 करोड़ रुपए पुण्य में खर्च किए। आजादी के बाद यज्ञशाला में लगा शिलालेख तक गायब हो अतिक्रमण की भेंट चढ़ गया है।
यज्ञ में मेवाड़ महाराणा जगत सिंह, कोटा महाराव दुर्जनसिंह, करौली महाराजा गोपाल सिंह आदि राजे महाराजे भी आए थे। ईश्वर विलास में लिखा कि कलयुग के प्रथम अश्वमेध का बनाया स्तंभ आज भी जर्जर हालत में मौजूद है।
इस अश्वमेघ यज्ञ में जो अश्व छोड़ा गया था,इसका नाम श्यामकर्ण था, उस पर महाराज जय सिंह ने जय पताका लिखी हुई थी,जिस वीर में दम है तो इस अश्व को रोक कर दिखाए, ये अश्व जयपुर राजवँश के अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा है.
ये घोड़ा कई राज्यों में घूमता हुआ ,प्रयागराज पहुंचा और फिर बापिस जयपुर आया, पर जयपुर के चांदपोल क्षेत्र में इस घोड़े को बाँसको ठिकाने के कुंभाणी राजपूतों ने रोकना चाह, उन्होंने घोड़े के मुख पर लिखी जय पताका को पढ़कर रहा नही गया पर सैनिको के हाथों वो वीरगति को प्राप्त हुए.
आज भी चांदपोल के पास इन वीरों की भोमिया रूप में पूजा होती है.
इस दुस्साहस के चलते सवाई जयसिंह ने कुंभाणी राजपूतों से कई जागीरे भी छीन ली थी.
तो ऐसा था, कलयुग का आखिरी अश्वमेघ यज्ञ.
जिसे सम्पन्न कराया था, भारत के महान राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने,ये वही सवाई जय सिंह जी हैं,जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर।परिसर में भी कई निर्माण कराए थे.
सवाई जय सिंह उस समय भारत के सबसे बड़े खगोल शास्त्री भी थे,जिन्होंने विश्व की सबसे बड़ी खगोल बैधशाला जन्तर मंतर का निर्माण कराया था, और न्यूटन के धातु निर्मित खगोल शाला को चुनौती भी दी, इन्ही सवाई जय सिंह ने देश की पहली स्मार्ट सिटी जयपुर को बसाया था, जो कि देश का पहला नगर था, जो कि नक्से के आधार पर बसाया गया था

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