शिव दो अक्षरों का नाम है :
शिव माने ईश्वर, परमकल्याण भाजन -
"शिवमस्ति अस्य इति शिव:।
शेते जगत् अस्मिन इति. शिव:।।"
जिसमें प्रलय के समय सारा जगत् , कोटि -कोटि ब्रह्माण्ड सावकाश शयन करते हैं उन का नाम है शिव ।
एकेन लभते मुक्तिं द्वाभ्यां शम्भूऋर्णी भवेत्।।
महादेव महादेव शशांक यो वदेत् ।
एक बार के नामोच्चारण से मुक्ति मिलती है! और दो बार के नामोच्चारण करने से शंकर जी ऋणी हो जाते है।
ये जपन्ति नरा भक्त्या तेषां मुक्तिर्न संशयः।।
ये जपन्ति नरा भक्त्या तेषां मुक्तिर्न संशयः।।
।। शिव लिंग प्रतिमा।।
शिव - ' श ' + ' इ ' + ' व '
- ' श ' कार अर्थात नित्य सुख एवं आनंद ।
- ' इ ' कार अर्थात पुरुष ।
- ' व ' कार अर्थात अमृतस्वरूपा भक्ति ।
शिव अर्थात ' कल्याण ' का प्रतीक , निश्चल ज्ञान , ब्रह्म तेज़ , सृजन - सृजनहार शक्ति का प्रतीक है ।
वहीं स्कन्दपुराणानुसार लिंग अर्थात ' लय ' , प्रलय के समय सब कुछ अग्नि मे परिवर्तित हो कर लिंग मे समा जाता है और पुन: सृष्टि के समय लिंग से ही प्रकट हो जाता है ।
"मूले ब्रह्मा मध्ये विष्णु त्रिभुवनेश्वर: रुद्रोपारि सदाशिव: ।
लिंगवेदी महादेवी लिंग साक्षान्महेश्वर: ।।"
(लिंग पुराण)
शिव लिंग मे सब से नीचे ब्रह्मा जी - मध्य मे श्री विष्णु भगवान - सबसे ऊपर स्वंयमेव भोलेनाथ महादेव विराजते हैं जब कि जलाधरी (अर्घा) तो साक्षात माता पार्वती हैं ।
(१) स्वयंभू लिंग
देवर्षियों की तपस्या से प्रसन्न हो कर उनके समीप प्रकट होने के लिये पृथ्वी के अन्तर्गत बीजरूप से व्याप्त भगवान शिव वृक्षों के अँकुर की भाँति भूमि को भेद कर ' नाद ' लिंग के रूप मे व्यक्त होते हैं और स्वंय प्रगट होने के कारण ' स्वयंभू ' कहलाते हैं ।
(२) बिन्दु लिंग
सोने या चाँदी के पात्र पर भूमि अर्थात वेदी पर अपने हाथ से लिखे शुद्ध प्रणवरूप लिंग मे भगवान शिव की प्रतिष्ठा और आवाहन् करने पर पूजा जाने वाला नाद लिंग - बिन्दु लिंग कहलाते हैं ---
इनमें स्थावर और जंगम दो भेद हैं ।
(३) प्रतिष्ठित लिंग
देवताओं और ऋषियों द्वारा आत्मसिद्घि के लिये वैदिक मन्त्रो के उच्चारण पूर्वक अपने हाथ से शुद्ध भावनापूर्वक पौरुष लिंग ही ' प्रतिष्ठित लिंग ' कहलाते हैं ।
(४) चर लिंग
लिंग , नाभि , जिव्हा , नासाग्र भाग , शिखा के क्रम मे कटि , हृदय , और मस्तिष्क मे की गयी लिंग की भावना ही ' अध्यात्मिकता ' है और यही चर लिंग कहलाते हैं ।
(५) गुरु लिंग
गुरु मे शिव भावना करना तथा उनके निर्देश से पूजन के लिये अस्थायी रूप से मिट्टी से बनाया हुआ लिंग , जिसे पूजन पश्चात विसर्जित किया जाता है ' गुरु लिंग ' कहलाते हैं ।
शिवजी सभी महात्माओं में महानतम हैं , फिर भी भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों से निकलने वाले शुद्धिकारक गंगाजल को अपने सिर पर धारण करते हैं ।
शिवजी तमोगुण के अधिष्ठाता हैं और अपने को दिव्य स्थिति मेँ अवस्थित रखने हेतु वै सदैव भगवान विष्णु का ध्यान करते रहते हैं।।
"श्मशान वासी शिव"
शिवजी श्मशान मे रहकर संसारिक प्राणियों को शिक्षा देते है कि यह जगत श्मशान ही है ।काशी महान श्मशान है , यह शरीर , घर आदि सभी "श्मशान है" ।
इस प्रकार "श्मशान" का अर्थ है सारा जगत् अर्थात् संसार की सभी वस्तु में शिव जी विद्यमान है ।
सारा जगत् श्मशान रुप है और शिव जी जगत् के प्रत्येक पदार्थ मे व्याप्त हैं , इसलिए वे व्यापक ब्रह्मरुप हैं। जगत् की प्रत्येक वस्तु मेँ शिवतत्त्व है।
भगवान शंकर आशुतोष हैं। शिवजी के दरबार में ऋषि , देव , दानव , मानव , एवं पिशाच सभी को प्रवेश मिला।


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