सत्संग
'सत्संग' शब्द हिन्दी में 'साथ' के अर्थ में होता है और सन्त में आसक्ति का नाम 'सत्सङ्ग' होता है । आसक्ति माने प्रीति । गीता में तो 'सत्' शब्द की 'डिक्शनरी' है
सद्भावे साधूभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते।।
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ।।
(गीता 17.26-27)
देखो 'सत्' शब्द का इसमें कितना अर्थ दिया है- सद्भाव, साधुभाव, प्रशस्त, कर्म, यज्ञ, दान, तप और इनके लिए जो प्रयत्न हैं उसके लिए भी 'सत्’ शब्द बनता है । शायद ऐसा और शब्द गीता में नहीं है, जिसके इतने अर्थ बताये गये हों ।
सत्सङ्ग का एक अर्थ यह है कि सत्स्वरूप जो आत्मा है, उसमें स्थित होना ।
दूसरा अर्थ हुआ कि अपने हृदय में जो सद्भाव है, दूसरों के प्रति साधु भाव है, दूसरों का भला करने का जो भाव है, उसमें स्थित रहना । जो अच्छे-अच्छे लोग हैं उनका संग करो और यज्ञ, दान, तप करो । इनके लिए प्रयास करो। इनको 'सत्' बोलते हैँ और फिर इन 'सत्' शब्द के अर्थ की प्राप्ति, जिस व्यक्ति के संग से मिलती हो, उस व्यक्ति के संग को 'सत्संग' कहते हैं ।
'सतां संगो हि भेषजम्' एक ने कहा कि गुड़ खा लो, फिर कहा कि नहीं, गुड़मार बूटी खालो । दूसरे ने कहा-खाना ही तो है गुड़ खाना भी खाना है और गुड़मार बूटी भी खाना है । चाहे जो खा लें । तीसरे ने कहा-नहीं । गुड़ आपके जीवन में मधुमेह पैदा कर सकता है और गुड़मार बूटी मधुमेह को मिटा सकती है । तो एक संग होता है जो संसार में आसक्ति बढ़ा करके फँसाता है और एक संग होता है वह, जो संसार से आसक्ति छुड़ाता है ।
सतां संगो हि भेषजं, सर्वसंगापहो हि माम्।
(भागवत ११-१२-२)
भवसागर से पार होने के लिये मनुष्य शरीर रूपी सुन्दर नौका मिल गई है। सतर्क रहो कहीं ऐसा न हो कि वासना की भँवर में पड़कर नौका डूब जाय।
स्वयं कमाओ, स्वयं खाओ यह प्रकृति है । (रजो गुण)
दूसरा कमाए, तुम छीन कर खाओ यह विकृती है (तमो गुण)
स्वयं कमाओ सबको खिलाओ, यह देविक संस्कृति हैं ! (सतो गुण)
देविक प्रवृतियों को धारण करे तभी आप देवलोक पाने के अधिकारी बनेंगे.
हमेशा ध्यान में रखिये
आप एक शुद्ध चेतना है यानि स्व ऊर्जा से प्रकाशित आत्मा ! माया (अज्ञान ) ने आपकी आत्मा के शुद्ध स्वरुप को छीन रखा है ! अतः माया ( अज्ञान ) से पीछा छुडाइये और शुद्ध चेतना को प्राप्त कर परमानन्द का सुख भोगिए !जिस प्रकार एक छोटे से बीज़ में विशाल वट वृक्ष समाया होता है उसी प्रकार आप में अनंत क्षमताएं समायी हुईं हैं. आवश्यकता है उस ज्ञान की अपना बौधिक एवं शैक्षणिक स्तर को उन्नत करने की जिसे प्राप्त कर आप महानता प्राप्त कर सके !
आओ हम सब वृक्ष लगाऐं धरती का श्रृंगार करें।
मातृभूमि को प्रतिपल महकाऐं,जीवन से हम प्रेम करें।।
प्रकृति का संरक्षण एवं संवर्धन ईश्वर की श्रेष्ठ आराधना है! एक पेड़ लगाना, सौ गायों का दान देने के समान है। पीपल का पेड़ लगाने से व्यक्ति को सेंकड़ों यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है l
छान्दोग्यउपनिषद् में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है
'दशकूप समावापी: दशवापी समोहृद:।
दशहृद सम:पुत्रो दशपत्र समोद्रुम:।। '
इस्लामी शिक्षा में पेड़ लगाने और वातावरण को हराभरा रखने पर जोर दिया गया है। पेड़ लगाने को सदका अथवा पुण्य का काम कहा गया है। पेड़ को पानी देना किसी मोमिन को पानी पिलाने के समान बताया गया है।

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