पुराणों शास्त्रो में काशी की महिमा
प्रत्येक भारतवासी का सौभाग्य है, की वह काशी जा सकता है।
काशी और भगवान शिव में भेद नही है।
हमारे शास्त्रो में काशी को इतना पवित्र स्थान माना गया है की निषिद्ध कर्म करने वाले जो नाना वर्ण के लोग हैं, महान् पापी और पापों के साक्षात घड़े, बाकी जो भी घृणित चाण्डाल आदि हैं, उन सबके लिये विद्वानों ने अविमुक्तक्षेत्र को उत्तम औषध माना है। अर्थात कोई कितना भी पातकी क्यो न् हो, वह काशी जाकर पूर्ण भक्ति से अवश्य ही अपने पाप धो लेता है।
चाहे वहाँ दुष्ट जाएं या अन्धे, दीन, कृपण, पापी और दुराचारी सबको भगवान् शिव अपनी कृपाशक्ति के द्वारा शीघ्र ही परम गति की प्राप्ति करा ही देते हैं।
ऐसा कृपा का अथाह सागर काशी है, यह ऐसा दिव्य स्थान है, जो पापी और पुण्यात्मा का भेद भी नही करता सब पर अपनी कृपा लुटाता है ।
उत्तर वाहिनी गङ्गा और पूर्व वाहिनी सरस्वती अत्यन्त पवित्र मानी गयी हैं । वहीं कपालमोचन है । उस तीर्थ में जाकर जो श्राद्ध में पिण्डदान के द्वारा पितरों को तृप्त करेंगे, उन्हें परम प्रकाशमान लोकों की प्राप्ति होती है। जो ब्रह्महत्यारा है, वह भी यदि कभी अविमुक्तक्षेत्र काशी की यात्रा करे तो उस क्षेत्र के माहात्म्यसे उसकी ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है । जो परम पुण्यात्मा मानव काशीपुरी में गये हैं, वे अक्षय, अजर एवं शरीर रहित परमात्म स्वरूप हो जाते हैं ।
कुरुक्षेत्र , हरिद्वार और पुष्कर में भी वह सद्गति सुलभ नहीं है, जो काशीवासी मनुष्यों को प्राप्त होती है। वहाँ रहने वाले प्राणियों को सब प्रकार से तप और सत्य का फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है, यह अटल सत्य है।
काशी की धूल अगर किसी के पांव में लगी हो, और दूसरे किसी के शरीर को वह धूल छू ले, तो भी वह आदमी सद्भाग्यशाली होता है।
जीवन मरण से चक्र से मुक्त हो जाता है। कहने का अर्थ है काशी की धूल भी इतनी पवित्र है, की वह भी बिना सद्कर्म के प्राप्त नही हो सकती, बिना शिवकृपा काशी की धूल भी संभव नही है ।
जो एक मास तक काशी में जितेन्द्रिय भाव से नियमित भोजन करते हुए निवास करता है, उसके द्वारा भलीभाँति महापाशुपत व्रत का अनुष्ठान सम्पन्न हो जाता है। तथा जन्म और मृत्यु के भय को जीतकर परम गति को प्राप्त होता है । वह पुण्यमयी निःश्रेयसगति तथा योगगति को पा लेता है। सैकड़ों जन्मों में भी योगगति नहीं प्राप्त की जा सकती ; परंतु काशीक्षेत्र के माहात्म्य तथा भगवान् शङ्कर के प्रभाव से उसकी प्राप्ति हो जाती है ।
जो प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक मासतक काशी में निवास करता है, वह जीवन भरके पाप को एक ही महीने में नष्ट कर देता है ।
जो मानव मृत्युपर्यन्त अविमुक्तक्षेत्र को नहीं छोड़ता और ब्रह्मचर्य पालन पूर्वक वहाँ निवास करता है, वह साक्षात् शङ्कर होता है । जो विघ्नों से आहत होकर भी काशी नहीं छोड़ता, वह जरा मृत्यु तथा इस नश्वर जन्म से छूट जाता है।
जो इस देह का अन्त होने तक निरन्तर काशीपुरी का सेवन करते हैं , वे मृत्युके पश्चात् हंसयुक्त विमान से दिव्यलोकों में जाते हैं।
जिसका चित्त विषयों में आसक्त है, जिसने भक्ति और सद्बुद्धि त्याग दी है, ऐसा मनुष्य भी इस काशी क्षेत्र में मरकर फिर संसार बन्धन में नहीं पड़ता ।
पृथ्वीपर यह काशी नामक श्रेष्ठ तीर्थ स्वर्ग तथा मोक्ष का हेतु है। जो वहाँ मृत्यु को प्राप्त होता है, उसकी मुक्ति में कोई संशय नहीं है।
सहस्रों जन्मोंतक योगसाधन करके योगी जिस पदको पाता है, वही परम मोक्षरूप पद काशी में मृत्यु होने मात्र से मनुष्य प्राप्त कर लेता है।
ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र , वर्णसंकर , म्लेच्छ कीट - पतंग आदि पाप - योनिके जीव , कीड़े , चींटियाँ तथा दूसरे दूसरे मृग और पक्षी आदि जीव काशी में समयानुसार (अपने आप) मृत्यु होने पर देवेश्वर शिवरूप माने गये हैं।
जो जीव वास्तव में वहाँ प्राण त्याग करते हैं, वे रुद्र शरीर पाकर भगवान् शिव के समीप आनन्द भोगते हैं । मनुष्य सकाम हो या निष्काम अथवा वह पशु - पक्षी की योनि में क्यों न पड़ा हो, अविमुक्तक्षेत्र ( काशी ) - में प्राण त्याग करने पर वह अवश्य ही मोक्ष का भागी होता है , इसमें संशय नहीं है । जो मानव सदा भगवान् शिव की भक्ति में तत्पर रहने वाले और उनके अनन्य भक्त हैं, उन्हीं के चिन्तन में जिनका चित्त आसक्त है और भगवान् शिव में ही जिनके प्राण बसते हैं, वे निःसंदेह जीवन्मुक्त हैं ।
अविमुक्त क्षेत्र में मृत्यु के समय साक्षात् भगवान् भूतनाथ कर्मप्रेरित जीवों के कानमें मन्त्रोपदेश देते हैं। स्वयं भगवान् श्रीराम ने अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो अविमुक्तनिवासी कल्याणकारी शिव से यह कहा है कि 'शिव ! तुम जिस किसी भी मुमूर्षु जीव के दाहिने कान में मेरे मन्त्रका उपदेश करोगे, वह मुक्त हो जायगा।' अतः भगवान् शिव की कृपाशक्ति से अनुगृहीत हो सभी जीव वहाँ परम गति को प्राप्त होते हैं।
यह मैंने अविमुक्तक्षेत्र के संक्षेप में बहुत थोड़े गुण बताये हैं। समुद्र के रत्नों की भाँति अविमुक्तक्षेत्र के गुणों का विस्तार अनन्त है l। जो ज्ञान - विज्ञान में निष्ठा रखने वाले तथा परमानन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, उनके लिये जो गति बतायी गयी है, निश्चय ही काशी में मरे हुए को वही गति प्राप्त होती है ।
काशी का योगपीठ है श्मशान - तीर्थ, जिसे मणिकर्णिका कहते हैं । अपने कर्म से भ्रष्ट हुए मनुष्यों को भी काशी के श्मशानादि तीर्थों में मोक्ष की प्राप्ति बतायी गयी है । काशी में भी अन्य सब तीर्थों की अपेक्षा मणिकर्णिका उत्तम मानी गयी है । वहाँ नित्य भगवान् निवास माना गया है।
दस अश्वमेध यज्ञों का जो फल बताया गया है, उसे धर्मात्मा पुरुष मणिकर्णिका में स्नान करके प्राप्त कर लेता है । जो यहाँ वेदवेत्ता ब्राह्मण को अपना धन दान करता है, वह शुभगति को पाता और अग्रि की भाँति तेज से उद्दीप्त होता है । जो मनुष्य यंहा उपवास करके ब्राह्मणों को तृप्त करता है, वह निश्चय ही सौत्रामणी यज्ञ। का फल प्राप्त करता है ।
जो मनुष्य यहाँ चार वत्सतरी से युक्त सौम्य स्वभाव के तरुण वृषभ को छत्र आदि से चिह्नित करके छोड़ता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है । इसमें संदेह नहीं कि वह पितरों के साथ मोक्ष को प्राप्त होता है । इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ, भगवान् शिव की प्रसन्नता के उद्देश्य से वहाँ जो कुछ भी धर्म आदि किया जाता है, उसका फल अनन्त है।
जो अविमुक्तक्षेत्र में महादेवजी की पूजा और स्तुति करते हैं , वे सब पापों से मुक्त एवं अजर - अमर हो कर स्वर्ग में निवास करते हैं। जो मुक्तात्मा पुरुष एकाग्रचित्त हो इन्द्रिय समुदायको संयममें रखकर ध्यान लगाये हुए शतरुद्री का जप करते हैं और अविमुक्तक्षेत्र में सदा निवास करते हैं, वे उत्तम द्विज कृतार्थ हो जाते हैं।
जो काशी में एक दिन उपवास करेगा, उसे सौ वर्षोंतक उपवास करने का फल प्राप्त होगा।
इसके आगे गंगा और वरुणा का संगम है, जो सायुज्य मुक्ति देने वाला है।
बुधवार को श्रवण और द्वादषी का योग हो, उस समय उस में स्नान करके मनुष्य मोक्षरूप फल पाता है । जो यहाँ उस समय श्राद्ध करता है, वह अपने समस्त पितरों का उद्धार करके विष्णुलोक में जाता है ।
गङ्गाके साथ वरणा और असि का जो संगम है, वह समस्त लोकों में विख्यात है, वहाँ विधिपूर्वक अश्वदान करके मनुष्य फिर इस संसार में जन्म नहीं लेता।
जो मनुष्य यहाँ भक्तिपूर्वक संगमेश्वर का पूजन करता है, वह निग्रह और अनुग्रह में समर्थ साक्षात् देवदेवेश्वर शिव (तुल्य) है ।

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