विशालाक्षी शक्तिपीठ
उत्तर प्रदेश के पुण्य धाम क्षेत्र काशी में,
मोक्षदायिनी गंगा नदी के तट पर स्थित है कल्याणमयी माँ विशालाक्षी का मंदिर है।
यह मंदिर माता के 51 शक्तिपीठ का हिस्सा है। साथ ही इस मन्दिर का उल्लेख त्रय देवी मन्दिर क्षेत्र के रूप में भी किया जाता है, जिसमें कांचीपुरम की माँ कामाक्षी, मदुरै की माँ मीनाक्षी एवं काशी की माँ विशालाक्षी का वर्णन आता है।
माँ विशालाक्षी का मन्दिर, काशीविश्वनाथ मन्दिर से कुछ ही दूर पर गंगा नदी के मीरघाट पर स्थित है। शक्तिपीठ महात्म्य के अनुसार यहाँ माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। इसलिए इस जगह को 'मणिकर्णिका घाट' भी कहते हैं। यहाँ शक्ति के रूप में 'विशालाक्षी' माता तथा भैरव के रूप में 'काल भैरव' को पूजा जाता है।
"एक आख्यान के अनुसार मां अन्नपूर्णा जिनके आशीर्वाद से संसार के समस्त जीव भोजन प्राप्त करते हैं, वो ही विशालाक्षी माता हैं। पौराणिक ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि सिद्ध धार्मिक नगरी काशी में एक बार भीषण अकाल की स्थिति पैदा हो गई।
इस सब ने भगवान शिव को अत्यंत विचलित कर दिया। तब उन्होंने स्वंय पात्र लेकर अन्नपूर्णा देवी से भिक्षा ग्रहण कर उनसे वरदान प्राप्त किया था। इस पर भगवती अन्नपूर्णा ने उनकी शरण में आने वाले को कभी धन-धान्य से वंचित नहीं होने का अभय आशीष दिया।"
विद्वानों में ऐसी मान्यता है कि यह शक्तिपीठ दुर्गा मां की शक्ति का प्रतीक है दुर्गा पूजा के समय हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस शक्तिपीठ के दर्शन करने के लिए देश के कोने-कोने से आते हैं। भक्त मानते हैं कि देवी विशालाक्षी की पूजा-उपासना से सौंदर्य,ऐश्वर्य और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। यहां दान, जप और यज्ञ करने पर मुक्ति प्राप्त होती है तथा साधक कभी भी दुख-दरिद्रता के जाल में नहीं फंसता है।
वाराणसी शहर देश के लगभग हर बड़े शहर से रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है। साथ ही अन्य पड़ोसी राज्यों से वाराणसी के लिए राज्य संचालित एवं निज़ी कंपनी की बस सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा भक्त निज़ी वाहनों से भी काशी विश्वनाथ की नगरी पहुंचते हैं, जहाँ वे माँ विशालाक्षी से वरदान प्राप्त करते हैं।
"वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषे लिंगधारिणी।"
"प्रयागे ललिता देवी कामाक्षी गंधमादने॥"
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