वाल्मीकि रचित रामायण और गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस में प्रसंगो के अंतर :-
रामचरितमानस वास्तव में 27वें श्वेतवराह कल्प के 7वें वैवस्वत मनु के शासन के 24 वें त्रेता में हुए रामावतार की कथा है। कल्पभेद के कारण मूल वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस की घटनाओं में अंतर है। अब सब को तो नही समाहित किया जा सकता किन्तु कुछ मुख्य घटनाओं को देख लेते हैं:-
रामायण का अर्थ है श्री राम का मंदिर, वहीं रामचरितमानस का अर्थ है श्री राम का सरोवर।
मंदिर में जाने के कुछ नियम होते हैं इसी कारण वाल्मीकि रामायण को पढ़ने के भी कुछ नियम हैं, इसे कभी भी कैसे भी नहीं पढ़ा जा सकता। इसके उलट रामचरितमानस को लेकर कोई विशेष नियम नहीं है।
◆वाल्मीकि रामायण की रचना संस्कृत भाषा में कई गयी है, वहीं रामचरितमानस अवधी भाषा में है।
◆रामायण के अनुसार वाल्मीकि प्रचेता के पुत्र थे जबकि तुलसीदास ने उन्हें रत्नाकर नामक डाकू बताया है जो देवर्षि नारद की प्रेरणा से मरा-मरा कहते हुए रामभक्त बन गए।
◆आधुनिक गणना के अनुसार वाल्मीकि रामायण का कालखंड लगभग 14000 वर्ष पूर्व का बताया गया है। हालांकि यदि पौराणिक गणना की बात की जाये तो इसका कालखंड करीब 870000 वर्षों के आस-पास का बनता है। दूसरी ओर गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना सन 1576 ईस्वी में समाप्त की।
◆सबसे बड़ा अंतर जो दोनों ग्रंथों में है वो ये कि वाल्मीकि रामायण के राम मानवीय हैं जबकि रामचरितमानस के राम अवतारी। चूंकि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे, उन्होंने श्रीराम का चरित्र सहज ही रखा है। वाल्मीकि के लिए राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, अर्थात पुरुषों में श्रेष्ठ। इसके उलट तुलसीदास के लिए श्रीराम ना केवल अवतारी हैं बल्कि उससे भी ऊपर परब्रह्म हैं।
◆महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में सांकेतिक रूप से बताया है कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं जबकि रामचरितमानस में, बल्कि बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं।
◆रामचरितमानस में दशरथ और कौशल्या को मनु एवं शतरूपा का अवतार बताया गया है जबकि रामायण में ऐसा कोई वर्णन नहीं है।
◆महर्षि वाल्मीकि ने भगवान शंकर की सहायता से रामायण की रचना की। ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास नें रामचरितमानस की रचना महाबली हनुमान की सहायता से की।
◆वाल्मीकि रामायण में ऐसा वर्णित है कि वनवास के समय श्रीराम की आयु 27 वर्ष की थी, माता सीता उनसे 9 वर्ष छोटी थी। ऐसा कोई वर्णन रामचरितमानस में नहीं है।
◆दोनों ग्रंथों के आकार में भी बहुत बड़ा अंतर है। जहाँ वाल्मीकि रामायण में 6 कांड एवं 24000 श्लोक हैं, वही रामचरितमानस में 7 कांड एवं 10902 दोहे हैं। कई लोग उत्तर कांड को वाल्मीकि रामायण का भाग मानते हैं किन्तु ये सत्य नहीं है। वास्तव में ये रामायण का उपसंहार है जो काकभुशुण्डि एवं गरुड़ के बीच के संवाद के रूप में है। इसे उत्तर रामायण कहा गया है, उत्तर कांड नहीं।
◆वाल्मीकि रामायण एवं मानस, दोनों में पहले 5 कांडों का नाम समान है - बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड एवं सुन्दर कांड। पर छठे कांड को महर्षि वाल्मीकि ने युद्ध कांड कहा है जबकि तुलसीदास ने लंका कांड।
◆रामचरितमानस में हर कांड मंगलचरण के आह्वान के साथ आरम्भ होता है। उसी प्रकार मानस के हर कांड का अंत भी तुलसीदास संस्कृत के दोहे के साथ करते हैं जबकि वाल्मीकि रामायण में ऐसा नहीं है।
◆वाल्मीकि रामायण में देवी सीता का चरित्र अपने पति के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित एक स्पष्टभाषी दृढ स्त्री का है जो अपने पति से किसी भी प्रकार भी कम नहीं है। वे श्रीराम के साथ वन जाने को एक निर्णय की भांति सुनाती है। रामचरितमानस की सीता भी पूर्ण रूपेण पतिव्रता है किन्तु उन्हें मितभाषी और लज्जापूर्ण बताया गया है जो वन जाने के लिए श्रीराम से आज्ञा मांगती है।
◆रामायण के अनुसार दशरथ की 350 से भी अधिक पत्नियाँ थी जिनमें कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकेयी प्रमुख थी। इसके उलट रामचरितमानस में दशरथ की केवल तीन ही पत्नियों - कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकेयी का ही वर्णन है।
◆पुत्रों की प्राप्ति के लिए ऋषि ऋष्यश्रृंग से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में है, रामचरितमानस में नहीं।
◆वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम के वनगमन के समय दशरथ उनसे कहते हैं वो उन्हें कारागार में डाल दे और फिर राजा बन जाये पर रामचरितमानस में ऐसा कोई वर्णन नहीं है।
◆रामायण में वनवास के समय महर्षि वशिष्ठ अत्यंत क्रोधित होकर कैकेयी से कहते हैं कि यदि राम वन जाएँ तो सीता को ही सिंहासन पर बिठाया जाये। स्त्री सशक्तिकरण का ये जीवंत उदाहरण है। रामचरितमानस में ऐसा वर्णन नहीं है।
◆रामायण के अनुसार भरत को पहले ही दशरथ की मृत्यु का आभास हो गया था। उन्होंने स्वप्न देखा कि दशरथ काले वस्त्र पहने हुए हैं जिनपर पीतवर्णीय स्त्रियां प्रहार कर रही हैं और वे गधों के रथ पर सवार तेजी से दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं। रामचरितमानस में दशरथ की मृत्यु के बाद उनका समाचार कैकेय देश में भिजवाया जाता है।
◆महर्षि विश्वामित्र द्वारा राम एवं लक्ष्मण को अनेकानेक सिद्धि प्रदान करना भी वाल्मीकि रामायण में विस्तार पूर्वक बताया गया है जो रामचरितमानस में सतही तौर पर बताया गया है।
◆रामायण में ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या को अदृश्य हो उसी आश्रम में रहने का श्राप मिला था जबकि रामचरितमानस में वे पत्थर की शिला बन जाती हैं।
रामायण में श्रीराम अहिल्या का पैर छूते हैं जिससे वो श्राप मुक्त हो जाती हैं। रामचरितमानस में श्रीराम अपने पैर को अहिल्या की शिला पर रख कर उसका उद्धार करते हैं।
◆भारत मिलाप के समय राजा जनक का वहाँ आना और भरत को समझाने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में है, रामचरितमानस में नहीं।
◆रामायण के अनुसार राजा जनक ने सीता स्वयंवर नहीं करवाया था। कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति उसे उठाने के लिए स्वतंत्र था। जब श्रीराम और लक्ष्मण जनकपुर आये तो राजा जनक ने उन्हें शिव धनुष दिखाया और श्रीराम ने विश्वामित्र की आज्ञा से वो धनुष उठा लिया और जनक ने देवी सीता का विवाह श्रीराम से किया। वहीं रामचरितमानस में राजा जनक ने सीता स्वयंवर का आयोजन किया और जब सभी राजा धनुष को उठाने में विफल रहे तब श्रीराम ने उस धनुष को उठा कर तोड़ दिया।
◆वाल्मीकि रामायण में भगवान शंकर के "पिनाक" धनुष का वर्णन है जिसे श्रीराम ने तोडा किन्तु रामचरतिमानस में उसे केवल "शिव धनुष" कहा गया है।
रामचरितमानस में रावण और बाणासुर के स्वयंवर सभा में आने का किन्तु बिना धनुष छुए चले जाने का वर्णन है जबकि रामायण में ऐसा नहीं है।
◆रामचरितमानस में शिव-पार्वती और अन्य देवताओं का रूप बदल कर श्रीराम और सीता के विवाह में आने का वर्णन है जबकि वाल्मीकि रामायण में ऐसा कोई वर्णन नहीं है।
◆रामचरितमानस के अनुसार धनुष टूटने पर परशुराम स्वयंवर स्थल में आये जबकि रामायण के अनुसार विवाह के बाद अयोध्या लौटते समय मार्ग में श्रीराम को परशुराम मिले।
◆श्रीराम का सीताजी को वाटिका में देखना और फिर देवी सीता द्वारा माता पार्वती की प्रार्थना करना कि श्रीराम ही उन्हें पति के रूप में प्राप्त हों, ये वर्णन केवल रामचरितमानस में मिलता है वाल्मीकि रामायण में नहीं।
◆वाल्मीकि रामायण में रावण, कुम्भकर्ण एवं विभीषण की तपस्या और उनके वरदानों का विस्तार से वर्णन है किन्तु रामचरितमानस में इसके विषय में अधिक वर्णन नहीं है।
◆वाल्मीकि रामायण में श्रीराम अपने बल और पराक्रम से खर-दूषण के 14000 योद्धाओं का अंत करते हैं किन्तु रामचरितमानस में वे सम्मोहनास्त्र का प्रयोग करते हैं जिससे वे सब आपस में युद्ध करते हुए मारे जाते हैं।
रामचरितमानस में खर-दूषण के संहार के समय ही रावण समझ जाता है कि श्रीराम नारायण के अवतार हैं किन्तु वाल्मीकि रामायण में युद्धकांड में कुम्भकर्ण एवं मेघनाद की मृत्यु के बाद रावण को समझ आता है कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं।
◆वाल्मीकि रामायण में रावण मरीच से दो बार सहायता मांगने आता है। रामचरितमानस में मारीच एक ही बार में मान जाता है।
◆वाल्मीकि रामायण में देवी सीता श्रीराम से उस स्वर्ण मृग को पकड़ कर लाने बोलती हैं ताकि वे उसे अयोध्या ले जा सके, जबकि रामचरितमानस में सीता उन्हें स्वर्ण मृग का चर्म लाने को बोलती है।
◆वाल्मीकि रामायण में मारीच मरते समय लक्ष्मण और सीता दोनों को सहायता के लिए पुकारता है जबकि रामचरितमानस में वो केवल लक्ष्मण को ही पुकारता है।
◆वाल्मीकि रामायण के अनुसार लक्ष्मण को पहले ही संदेह हो जाता है कि स्वर्णमृग कोई मायावी राक्षस है जबकि रामचरितमानस में ऐसा नही होता।
◆लक्ष्मण रेखा का वर्णन केवल रामचरितमानस में है, वाल्मीकि रामायण में नहीं।
◆रामायण में सीता का वास्तव में अपहरण हुआ था वहीं रामचरितमानस में रावण जिस सीता का अपहरण कर ले गया वो वास्तविक सीता की छाया थी। असली सीता को श्रीराम ने उनकी सुरक्षा के लिए अग्निदेव को दे दिया था। इसीलिए रामायण में सीता की अग्नि परीक्षा का कोई प्रसंग नहीं है पर रामचरितमानस में सीता अग्नि परीक्षा देती हैं ताकि अग्निदेव असली सीता को श्रीराम को लौटा सकें।
◆वाल्मीकि रामायण में जटायु ने रावण का रथ तोड़ दिया और तब वो वायु मार्ग से लंका पहुँचता है। रामचरितमानस में ये प्रसंग नहीं है।
◆वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण ने वेदवती नामक स्त्री को देखा और उसका अपहरण करने का प्रयास किया। तब वेदवती ने उसे ये श्राप दिया कि अगले जन्म में वही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी और आत्मदाह कर लिया और माता सीता के रूप में जन्मी। ये वर्णन रामचरितमानस में नहीं है।
◆वाल्मीकि रामायण में कुम्भकर्ण के दो बार जागने का वर्णन है। पहले भी वो सीता हरण पर रावण की निंदा करता है। रामचरितमानस में कुम्भकर्ण केवल एक ही बार जगा है।
◆रामचरितमानस में लक्ष्मण को अत्यंत क्रोधी एवं उत्तेजी दिखाया गया है। मानस में वे बात-बात पर क्रोधित होते हैं, स्वयंवर में जनक और परशुराम से उलझ जाते हैं। वाल्मीकि रामायण में उन्हें धीर-गंभीर और विवेकी बताया गया है। मूल रामायण में लक्ष्मण केवल तीन समय पर क्रोधित होते हैं - पहला जब उन्हें श्रीराम के वनवास का समाचार मिलता है, दूसरा जब चित्रकूट में भरत श्रीराम से मिलने आते हैं और तीसरा जब वे सुग्रीव को उसकी प्रतिज्ञा याद दिलाने किष्किंधा पहुँचते हैं।
◆रामचरितमानस के अनुसार जब समुद्र सेना को मार्ग नहीं देता तो लक्ष्मण अत्यंत क्रोधित होते हैं और श्रीराम से समुद्र को सुखा देने को कहते हैं जबकि मूल वाल्मीकि रामायण में श्रीराम समुद्र पर क्रोधित हुए और लक्ष्मण ने उन्हें शांत किया।
◆रामचरितमानस में श्रीराम को कई बार भगवान शंकर की पूजा करते दिखाया गया है पर वाल्मीकि रामायण में केवल महादेव को श्रीराम का आराध्य बताया गया है।
◆वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम जब रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की स्थापना करते हैं तो उसकी व्याख्या करते हैं कि जो राम का ईश्वर है वही रामेश्वर है।
◆रामचरितमानस में भी श्रीराम यही कहते हैं पर उसमें महादेव माता पार्वती से कहते हैं कि राम जिनके ईश्वर हैं वो रामेश्वरम हैं।
◆रामायण में केवट नामक कोई चरित्र नहीं है, ये केवल रामचरितमानस में है।
◆निषादराज गुह को भी रामचरितमानस में श्रीराम के साथ भरद्वाज ऋषि के आश्रम में जाते हुए दिखाया गया है जबकि रामायण में वे केवल तमसा तट पर ही श्रीराम से मिलते हैं।
◆रामायण में भरद्वाज ऋषि श्रीराम को चित्रकूट में रहने का सुझाव देते हैं जबकि रामचरितमानस में उन्हें ये सुझाव महर्षि वाल्मीकि देते हैं।
◆रामचरितमानस सुतीक्ष्ण ऋषि श्रीराम से उनका आशीर्वाद मांगते हैं, रामायण में ऐसा कोई वर्णन नहीं है।
◆वाल्मीकि रामायण में हनुमान को मनुष्य बताया गया है जो वानर समुदाय के थे और वन में रहते थे। रामचरितमानस में हनुमान को बन्दर प्रजाति का बताया गया है।
◆वाल्मीकि रामायण में हनुमान को कहीं भी सीधे तौर पर भगवान शंकर का अवतार नहीं बताया गया है किन्तु रामचरितमानस में उन्हें "शंकर-सुमन" कहा गया है।
◆रामायण में ऋष्यमूक पर्वत पर जब हनुमान को जब श्रीराम अपना परिचय देते हैं तब उन दोनों में मित्रता होती है। रामचरितमानस में हनुमान पहले से ही श्रीराम के सबसे बड़े भक्त हैं।
◆रामायण में जब लक्ष्मण क्रोध में सुग्रीव के महल पहुँचते हैं तब सुग्रीव वानरों को सीता की खोज में भेजते हैं। रामचरितमानस में वे पहले ही वानरों को सीता की खोज में भेज चुके होते हैं।
◆रामायण में जब हनुमान का दल माता सीता को खोजते हुए थक जाता है तब अंगद के मन में विद्रोह के भाव आते हैं। तब हनुमान उन्हें समझाते हैं। ये वर्णन रामचरितमानस में नहीं है।
◆रामचरितमानस में जब हनुमान लंका पहुँचते हैं तो वे विभीषण से मिलते हैं और वही उन्हें अशोक वाटिका का मार्ग बताते हैं। रामायण में हनुमान खुद सारी लंका में खोजते हुए अशोक वाटिका पहुँचते हैं।
◆वाल्मीकि रामायण में मंदोदरी को देख कर उनके सीता होने का भ्रम हो जाता है किन्तु रामचरितमानस में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है।
◆रामायण में हनुमान सीता के समक्ष आकर अपना परिचय देते हैं और फिर उन्हें मुद्रिका देते हैं। रामचरितमानस में हनुमान वृक्ष पर से मुद्रिका सीता की गोद में गिरा कर तब उनके सामने आते हैं।
◆वाल्मीकि रामायण में हनुमान देवी सीता से अपने साथ चलने का निवेदन करते हैं किन्तु सीता ये कहते हुए मना कर देती है कि वो जान-बूझ कर पर पुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त वे चाहती हैं कि ये श्रेय श्रीराम को मिले। रामचरितमानस में हनुमान कहते हैं कि वे उन्हें साथ ले जा सकते हैं किन्तु श्रीराम की ऐसी आज्ञा नहीं है।
◆वाल्मीकि रामायण के अनुसार माता सीता अपनी चूड़ामणि हनुमान को पहले ही दे देती है किन्तु रामचरितमानस में लंका दहन के बाद वे उन्हें चूड़ामणि देती है।
◆वाल्मीकि रामायण में सभा में अपना अपमान होने के बाद विभीषण खुद लंका छोड़ कर चले जाते हैं। रामचरितमानस में रावण विभीषण को लात मार कर लंका से निकाल देता है।
◆रामायण में शुक एवं सारण को विभीषण पहचानते हैं पर रामचरितमानस में शुक-सारण को वानर पकड़ते हैं।
◆रामचरितमानस के अनुसार रामसेतु का निर्माण नल एवं नील दोनों ने किया था किन्तु वाल्मीकि रामायण में रामसेतु का निर्माण केवल नल ने किया था।
◆रामचरितमानस में श्रीराम अपने एक बाण से रावण का मुकुट एवं मंदोदरी के कुंडल गिरा देते हैं। वाल्मीकि रामायण में ऐसा कोई वर्णन नहीं है।
◆रावण के दरबार में अंगद का पैर जमा देना और किसी का उसे ना उठा पाना तथा रावण का मुकुट श्रीराम के पास फेंक देने का वर्णन केवल रामचरितमानस में है, वाल्मीकि रामायण में नहीं।
◆वाल्मीकि रामयण के अनुसार रावण और श्रीराम का युद्ध दो बार हुआ था किंतु रामचरितमानस के अनुसार रावण युद्ध में केवल एक बार अंत समय में आया और उसका वध हुआ।
◆रामचरितमानस के अनुसार रावण इंद्र के रथ के घोड़े एवं सारथि को गिरा देता है जिसका वाल्मीकि रामायण में कोई वर्णन नहीं है।
◆रामायण में रावण ने जो शक्ति लक्ष्मण पर चलाई वो उसे मय दानव ने दी थी जबकि रामचरितमानस के अनुसार उसे ये शक्ति भगवान ब्रह्मा ने दी थी।
◆रामायण में संजीवनी बूटी लाने का दो बार वर्णन है जबकि रामचरितमानस में एक बार।
◆कालनेमि द्वारा हनुमान के वध का प्रयास करने का वर्णन भी केवल रामचरितमानस में है, वाल्मीकि रामायण में नहीं।
◆संजीवनी बूटी लाते समय भरत का हनुमान पर बाण चलाना रामचरितमानस में है, रामायण में नहीं।
◆रामायण में मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस लक्ष्मण ही करते हैं किन्तु रामचरितमानस में ऐसा वानर करते हैं।
◆रामायण में लक्ष्मण मेघनाद का सर काटते हैं, रामचरितमानस में उसका वध लक्ष्मण उसकी छाती में बाण मार कर करते हैं।
◆रामायण में सुषेण वैद्य वानर है जबकि रामचरितमानस में वो राक्षस हैं जो लंका के वैद्य है। हनुमान द्वारा सुषेण को उठा कर लाने का वर्णन भी केवल रामचरितमानस में है, रामायण में नहीं।
◆रामायण में इंद्र के सारथि मातलि श्रीराम को बताते हैं कि रावण का वध कैसे संभव है जबकि रामचरितमानस में ये बात विभीषण बताते हैं।
◆रावण की नाभि में अमृत होने का वर्णन केवल रामचरितमानस में है, रामायण में नहीं।
◆रामचरितमानस के अनुसार रावण का वध 31 बाणों द्वारा हुआ जबकि वाल्मीकि रामायण में रावण का वध ब्रह्मास्त्र से हुआ।
◆श्रीराम के ह्रदय पर उस समय प्रहार करना जब वो सीता का स्मरण ना कर रहा हो, इसका वर्णन भी केवल रामचरितमानस में है, वाल्मीकि रामायण में नहीं।
◆श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद हनुमान का अपना ह्रदय चीर कर दिखाने का वर्णन भी केवल रामचरितमानस में है, रामायण में नहीं।
◆रामायण में इंद्र युद्ध के बाद सभी वानरों एवं रीछों को पुनर्जीवित कर देते हैं, रामचरितमानस में यही काम वे अमृत की वर्षा कर करते हैं।
◆रामचरितमानस में श्रीराम का चमत्कार द्वारा अनेक रूप लेकर अयोध्या वासियों से मिलने का वर्णन है जबकि रामायण में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है।
◆रामायण के अनुसार श्रीराम सरयू में समाधि लेकर अपनी लीला समाप्त करते हैं। रामचरितमानस का अंत लव एवं कुश के जन्म के साथ होता है।
◆रामचरितमास में सती द्वारा श्रीराम की परीक्षा लेते हुए दिखाया गया है, वाल्मीकि रामायण में ऐसा कोई वर्णन नहीं है।
◆रामचरितमानस में भगवान शिव और पार्वती के विवाह का वर्णन करते समय उन्हें श्रीगणेश की पूजा करते हुए दिखाया गया है जो कि अतार्किक है।
◆रामचरितमानस में विशेषकर इंद्र का बहुत चरित्र हनन किया गया है। वाल्मीकि रामायण में इंद्र और अन्य देवताओं का महत्त्व बताया गया है।
इसके अतिरिक्त कई ऐसी चीजें हैं जिनका वर्णन ना ही वाल्मीकि रामायण में और ना ही रामचरितमानस में किया गया है किन्तु फिर भी वे कई लोक कथाओं के रूप में प्रचलित हैं।
जैसे कि :-
●दोनो में कही भी हनुमान को रुद्रावतार नहीं कहा गया है।
●किसी भी वानर अथवा रीछ के पास कोई गदा अथवा अन्य कोई हथियार नहीं था। युद्ध उन्होंने अपने बाहुबल, दांत, नख, पत्थर, पहाड़, शिला, पेड़ इत्यादि द्वारा ही लड़ था।
●श्रवण कुमार का अपने माता-पिता को कांवड़ में उठा कर यात्रा करने का कोई वर्णन नहीं है।
●सीता हरण के लिए रावण ने पुष्पक विमान का प्रयोग नहीं किया था।
●शबरी के जूठे बेर का वर्णन कही नहीं है।
●बाली के साथ युद्ध करते हुए प्रतिद्वंदी का आधा बल उसमें आ जाने का कोई वर्णन नहीं है।
●रामसेतु के निर्माण के समय किसी गिलहरी का कोई वर्णन नहीं है।
●लक्ष्मण को शक्ति रावण ने मारी थी ना कि मेघनाद ने।
●अहिरावण, महिरावण, पंचमुखी हनुमान, मकरध्वज इत्यादि का कोई वर्णन नहीं है।
●मृत्यु के समय लक्ष्मण द्वारा रावण से शिक्षा लेने का कोई प्रसंग नहीं है।
●मंदोदरी का विभीषण से विवाह का प्रसंग भी कही नहीं है।
●सुलोचना के पास मेघनाद का सर गिरने का कोई प्रसंग नहीं है।
●अयोध्या में कर प्राप्त करने के लिए धर्म कांटे के निर्माण का कोई वर्णन नहीं है।
●श्रीराम द्वारा पतंग उड़ाना, उसके सहारे हनुमान का स्वर्गलोग तक चले जाने का कोई वर्णन किसी ग्रंथ नहीं है।
●श्रीराम की मुद्रिका छिद्र में गिर जाना और हनुमान का उसे ढूंढते हुए पाताल में पहुँच जाने का कोई वर्णन नहीं है।
●युद्ध से पहले रावण का स्वयं श्रीराम के राजपुरोहित बनने का भी वर्णन किसी ग्रंथ में नही है।
●लव-कुश द्वारा अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को पकड़ने और फिर शत्रुघ्न, लक्ष्मण, हनुमान इत्यादि के साथ उनके युद्ध का कोई वर्णन नही है।
और अंत मे वाल्मीकि रामायण के 24000 श्लोकों में हर 1000वें श्लोक के पहले अक्षर को मिलाएं तो इससे गायत्री मन्त्र का निर्माण होता है l
🚩जय श्री राम🚩
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