वाल्मीकि रामायण प्रश्नोत्तरी 1- 100 :-
१. दुनिया का प्रथम महाकाव्य :- रामायण।
२. वाल्मीकि रामायण में २४००० श्लोक हैं।
३. वाल्मीकि रामायण में सात काण्ड हैं।
४. महर्षि वाल्मीकि ने भगवान श्रीराम जी के जन्म पूर्व ही रामायण की रचना कर दी थी।
५. महर्षि वाल्मीकि के पिता ऋषि प्रचेता व माता चर्षिणी थी।
६. राजा दशरथ अयोध्या के राजा थे।
७. राजा दशरथ की तीन पत्नियाँ थीं :-
१.माता कौशल्या
२.माता कैकेयी
३.माता सुमित्रा
८. राजा दशरथ के चार पुत्र थे।
माता कौशल्या से श्रीराम
माता कैकेयी से भरत
माता सुमित्रा से लक्ष्मण व शत्रुघ्न
९. श्रीराम,भरत,लक्ष्मण व शत्रुघ्न चारों भाइयों के गुरु "गुरु वशिष्ठ" थे।
१०. श्रीराम व लक्ष्मण को ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अतिरिक्त शस्त्र व शास्त्र की शिक्षा दी थी तथा अक्षय अस्त्र व शस्त्र प्रदान किया।
११. ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का पहले नाम राजा विश्वरथ था।
१२. महर्षि विश्वामित्र राम व लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिये राजा दशरथ से माँगकर ले गये।
१३. श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र की यज्ञ रक्षा के जाते समय गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या जो कि शाप के कारण पत्थर हो गई थी का उद्धार किया।
१४. भगवान राम ने साधु,सन्यासियों,ऋषियों-महर्षियों की हड्डी के ढेर को देखकर राक्षसों के विनाश का संकल्प लिया।
१५. भगवान राम ने सर्वप्रथम ताटका को मारा।
१६. भगवान राम ने महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते समय सुबाहु तथा उसकी सेना को मारा व मारीचि को मूर्छित करके छोड़ दिया।
१७. भगवान राम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव के पिनाक धनुष को तोड़कर माता सीता का वरण किया।
१८. भगवती सीता का प्रकाट्य राजा जनक के हल चलाते समय धरती से हुआ था।
१९. माता सीता के पिता राजा जनक का नाम सीरध्वज था।उनकी दूसरी पुत्री का नाम उर्मिला था।
२०. राजा जनक के अनुज कुशध्वज की भी दो पुत्रियाँ थी:-
१. माण्डवी
२. श्रुतिकीर्ति
२१. लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से हुआ था।
२२. भरत का विवाह माण्डवी से हुआ था।
२३. शत्रुघ्न का विवाह श्रुतिकीर्ति से हुआ था।
२४. पिनाक धनुष खण्डित हो जाने के बाद भगवान परशुराम का श्रीराम से विवादोपरांत श्रीराम नारायण हैं ऐसा संशय होने पर श्रीविष्णु के धनुष सारंग पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिये दिया।
२५. श्रीराम जी के राज्याभिषेक के समय माता कैकेयी ने राजा दशरथ से श्रीराम के लिये चौदह वर्ष के लिये वनवास व भरत के लिये राजगद्दी माँगा।
२६. श्रीराम सन्यासी वेश में माता सीता व अनुज लक्ष्मण के साथ वन को गये।
२७. वन जाते समय भगवान श्रीराम श्रृंगवेरपुर ग्राम में रुके।
२८. श्रृंगवेरपुर ग्राम में भगवान की भेंट निषादराज से हुई।
२९. भगवान राम वन जाते समय सर्वप्रथम तमसा नदी पार करके गोमती नदी पार करते हुये प्रयागराज के निकट श्रृंगवेरपुर पहुँचे थे।
३०. प्रयागराज में ही गंगा पार करने के लिये केवट संवाद हुआ।
३१. प्रयागराज में ही ऋषि भारद्वाज से भगवान श्रीराम जी से भेंट हुई।
३२. गङ्गा नदी पार कर भगवान चित्रकूट रुके।
३३. चित्रकूट में श्रीराम को मनाने भरत पूरी सेना व तीनों माताओं,गुरु वशिष्ठ व राजा जनक के साथ आये।
३४. श्रीराम के वन गमन के बाद राजा दशरथ का पुत्रशोक के कारण मृत्यु हो गई।
३५. राजा दशरथ का अनजाने में किये गये श्रवण कुमार के वध के कारण श्रवण कुमार के पिता का शाप था कि पुत्र शोक के कारण उनकी भी मृत्यु हो।
३६. श्रीराम ने भरत को स्वर्गवासी पिता की आज्ञा के अनुसार चौदह वर्ष वन पूर्ण करके ही लौटने का आश्वासन दिया।
३७. भरत चित्रकूट से भगवान श्रीरामचन्द्र की चरण पादुका लेकर अयोध्या लौटे।
३८. भगवान श्रीराम की चरण पादुका राजसिंहासन पर रखकर चौदह वर्ष शासन किया।
३९. भरत स्वयं चौदह वर्ष सन्यासी की भाँति अयोध्या में कुटी में रहते हुये, भूमि शैय्या करते हुये राजकाज को संभाला।
४०. भगवान श्रीराम की भेंट अत्रि ऋषि व माता अनुसूया से चित्रकूट में हुई।
४१. माता अनुसूया ने माता सीता को कभी न जीर्ण शीर्ण होने वाले दिव्य वस्त्राभूषण भेंट की।
४३. चित्रकूट से निकलकर श्रीरामचन्द्र दंडकारण्य पहुँचे।
४४. दण्डकारण्य में सर्वप्रथम श्रीराम जी ने विराध राक्षस को मार।
४५. ऋषि शरभंग ने जब सुना कि उनके आश्रम में श्रीराम आने वाले हैं तो उन्होंने ब्रह्मलोक प्रस्थान करने से देवराज इंद्र को मना कर दिया और भगवान की राह देखने लगे।
४६. भगवान श्रीराम की भेंट सुतीक्ष्ण मुनि से हुई उन्होंने भगवान श्रीराम को महामुनि अगस्त्य के आश्रम का पता बताया।
४७. महामुनि अगस्त्य ने श्रीरामचन्द्र को भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित भगवान श्रीविष्णु का धनुष,अक्षय तरकस,इंद्र के द्वारा दिव्य बाण व दो तलवारें भेंट की।
४८. अगस्त्य ऋषि की आज्ञानुसार भगवान श्रीराम ने पंचवटी में आश्रम बनाया।
४९. नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट।
५०. पंचवटी में शूपर्णखा का भगवती सीता पर आक्रमण करने पर श्री लक्ष्मण द्वारा नाक कान काटा गया।
५१. श्रीराम ने लक्ष्मण के संग चौदह हजार राक्षसों सहित खर दूषण का वध किया पंचवटी में किया।
५२. रावण के कहने पर मारीच ने सुवर्ण का मृग बनकर श्रीराम के आश्रम के निकट आकर सीता को मोहित किया।
५३. सीता के कहने पर श्रीराम जी सुवर्ण मृग को मारने के लिये जंगल में उसके पीछे पीछे गये।
५४. मरते समय रावण की योजनानुसार मारीच ने लक्ष्मण और सीता को पुकारा।
५५. सीता माता के मार्मिक वचन के कारण लक्ष्मण आश्रम में सीता माता को अकेली छोड़कर श्रीराम को ढूढ़ने चले गये।
५६. राक्षसराज रावण ने साधु का झूठा वेश धारणकर अकेली सीता माता का छल से हरण कर लिया।
५७. सीताहरण कर पुष्पक विमान से जाते समय पक्षीराज जटायु ने रावण को रोकने का प्रयास किया।
५८. रावण और जटायु का युद्ध हुआ।रावण ने दिव्यास्त्र से जटायु के पंख काट दिये।
५९. सीता माता ने एक पर्वत पर बैठे पाँच वानर समूहों को देखकर अपने आभूषण निकालकर नीचे डाल दिये।
६०. रावण ने माता सीता को अपने महल आदि दिखाये तथा पटरानी बनने का लोभ दिया,माता सीता से फटकारे जाने के कारण उनको राक्षसियों की सुरक्षा में अशोक वाटिका में रखा गया।
६१. ब्रह्मा जी के कहने पर भगवती सीता को इंद्र ने अशोक वाटिका में दिव्य खीर खिलाया जिससे उनकी हजार वर्षों के लिये भूख और प्यास शांत हो गयी।
६२. श्रीराम ने सीता की खोज के लिये वन में भटकते समय घायल पक्षीराज जटायु को देखा उनके द्वारा सीताहरण तथा रावण के द्वारा युद्ध में घायल होने की घटना को सुनकर उनको गले लगाकर विलाप किये।
६३. पुण्यात्मा जटायु ने भगवान श्रीरामचन्द्र की बाहों में ही अपने प्राण को त्याग दिये।
६४. श्रीरामचन्द्र जी ने पुत्र की भाँति जटायु का अंतिम संस्कार किया।
६५. माता सीता को ढूढ़ते समय लक्ष्मण पर अयोमुखी नामक राक्षसी ने आक्रमण किया। श्री लक्ष्मण ने उसके भी नाक, कान आदि काटकर भागने पर विवश कर दिया।
६६. भगवान श्रीराम व लक्ष्मण को कबन्ध राक्षस द्वारा अपनी हजार योजन लम्बी भुजाओं में जकड़ लेने पर दोनों भाइयों ने तलवार से उसको भुजाओं को काट दिया।
६७. कबन्ध के कहने पर श्रीराम ने उसका शास्त्रोक्त दाह संस्कार किया।
६८. दाह संस्कार के बाद कबन्ध ने दिव्य रूप धारण कर श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता की सलाह दी।
६९. सुग्रीव चार अन्य वानरों के संग अपने भाई इंद्रकुमार बाली द्वारा राज्य से निष्कासित हो करके पम्पा सरोवर के निकट ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे।
७०. पम्पासर के निकट ही मतंग मुनि के आश्रम में रह रही माता शबरी से भी मिलने का आग्रह कबन्ध ने श्रीराम से किया तथा सबका पता बताकर स्वर्गलोक चला गया।
७१. माता शबरी से मतङ्ग ऋषि के आश्रम में भेंटकर उनको दिव्यधाम पहुँचाकर भगवान श्रीराम सुग्रीव से मिलने पंपासरोवर की चले गये।
७२. श्रीराम व लक्ष्मण को ऋष्यमूक पर्वत की ओर आते देख संकित सुग्रीव ने दोनों भाइयों का भेद लेने के लिये श्री हनुमान को भेजा।
७३. श्री हनुमान द्वारा श्रीराम,लक्ष्मण के वन में आने का तथा ऋष्यमूक पर्वत पर आने का कारण जान लेने के उपरांत श्री सुग्रीव से मित्रता करा दी।
७४. श्रीराम ने मित्र सुग्रीव को बाली वध करने का आश्वासन दिया।
७५. श्रीराम बाली का वध कर पायेंगे इस पर संशय होने पर बाली के बलाबल का परिचय सुग्रीव ने राक्षस दुंदुभि जो कि एक हजार हाथियों का बल था कैसे खेल खेल में सौ योजन फेंक दिया था तथा सात शाल के वृक्षों को कैसे हिलाकर पत्तीविहीन कर देता था,श्रीराम व लक्ष्मण को बताया।
७६. सुग्रीव ने बताया जो दुंदुभि की हड्डियों को सौ धनुष दूरी फेंक सके तथा जो एक भी शाल के वृक्ष को अपने बाणों से भेंद सकें वह बाली से लड़ने के समकक्ष है।
७७. भगवान श्रीराम ने अंगुष्ठ प्रहार से पर्वताकार दुंदुभि की हड्डियों को दस हजार योजन दूर फेंक दिया तथा भगवान श्रीराम के एक ही बाण से सातों शाल वृक्षों को भेदकर वह बाण सातों तलों को भेदता हुआ पाताल में प्रवेश कर गया।
७८. भगवान श्रीराम ने सुग्रीव को माला पहनाकर बाली से युद्ध के लिये ललकारने के लिये कहा तथा बाली व सुग्रीव के युद्ध के समय भगवान श्रीराम ने एक वृक्ष के पीछे होकर बाली पर बाण चलाकर उसका वध कर दिया।
७९. बाली को वरदान था जो भी उसके सामने आकर युद्ध करेगा उसकी आधी शक्तियाँ बाली में चली जायेंगी।
८०. भगवान श्रीराम द्वारा बाली को मारने पर बाली ने श्रीराम की निंदा की और अपने को इस प्रकार से श्रीराम द्वारा छिपकर मारे जाने का कारण पूँछा तथा इसकी निंदा की।
८१. श्रीराम ने अपने को भरत का प्रतिनिधि बताया तथा इच्छवाकु वंशी राजा ही सम्पूर्ण पृथ्वी के राजा है तथा दण्डाधिकारी हैं ये बात बताई तथा बाली के अधर्म कार्य से उसको अवगत कराया।
८२. साधु पुरुषों का शत्रु तथा राक्षसों से उसकी मैत्रीभाव उसके अधार्मिक गुण को दर्शाता है।
८३. भगवान श्रीराम ने कहा कि बड़ा भाई,पिता तथा गुरु तीनों पितृतुल्य हैं ठीक इसी प्रकार छोटा भाई,पुत्र व गुणवान शिष्य पुत्र तुल्य है।
८४. भगवान श्रीराम ने कहा कि कन्या,अपनी पुत्री,बहन तथा छोटे भाई की पत्नी को गलत दृष्टि से देखने वाले का वध कर देना ही न्याय व धर्म है।
८५. बाली ने भगवान श्रीराम की अलौकिकता को बताया कि वह पहले से जान गया था इसलिये नीति मर्मज्ञ पत्नी तारा के मना करने पर भी वह सुग्रीव से लड़ने आया और भगवान के हाथों से मृत्यु को प्राप्तकर मोक्ष को प्राप्त किया।
८६. बाली ने अङ्गद को सुग्रीव के प्रति निष्ठा तथा भक्ति के लिये आज्ञा की तथा सुग्रीव को पत्नी तारा की चिंता करने के लिये संकल्प लिया उसके बाद भगवान श्रीराम के चरणों का ध्यान करते हुये प्राण त्याग दिये।
८७. भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को भेजकर सुग्रीव व अङ्गद का राज्याभिषेक कराया।
८८. चातुर्मास (वर्षा ऋतु) बीत जाने के बाद सुग्रीव ने सभी बानर व ऋक्ष यूथपतियों को सेना सहित बुलाकर सभी दिशाओं में माता सीता की खोज के लिये भेज दिया।
८९. अङ्गद को सेनापति बनाकर हनुमान, जामवन्त,नल नील आदि बड़े बड़े यूथपतियों को दक्षिण दिशा में भेजा क्योंकि राक्षसराज रावण दक्षिण दिशा में ही सिंहल दीप लङ्का नामक नगरी में रहता था।
९०. समुद्र तट पर अङ्गद सेना सहित पहुँचकर अथाह सागर देखकर हतप्रभ तथा निःसहाय हो गये। वहाँ उनकी भेंट पक्षीराज जटायु के बड़े भाई सम्पाती से भेंट हुई, उन्होंने सीता माता का पता समुद्र उसपार लंका में अशोक वाटिका में बताया।
९१. समुद्र उसपार कोई जाने में समर्थ न रहा तो अपना बल व शक्ति भूल चुके श्री हनुमान को जामवन्त ने उनके बल पौरुष आदि का याद दिलाया तो श्री हनुमान समुद्र उसपार गये।
९२. समुद्र उसपार जाते समय सर्वप्रथम मैनाक पर्वत श्री हनुमान का रास्ता रोककर उनको विश्राम करने का आग्रह किया तो श्रीहनुमान ने श्रीराम कार्य किये बिना विश्राम करने से मना कर दिया।
९३. समुद्र में नाग माता सुरसा ने हनुमान जी का रास्ता रोककर उनको निगलने का स्वाँग देवताओं के कहने पर उनके बलाबल व बुद्धि कौशल के परीक्षण के लिये रचा।हनुमानजी माता सुरसा की परीक्षा में उत्तीर्ण हुये।
९४. हनुमानजी के प्रतिबिम्ब को समुद्र में सिंहिका नामक राक्षसी ने पकड़कर उनकी गति को अवरुद्ध कर दिया।श्री हनुमान ने सिंहिका का वध कर दिया।
९५. हनुमान जी को लङ्का में प्रवेश करते समय लंकिनी नामक ब्रह्मा जी द्वारा लङ्का की सुरक्षा के लिये नियुक्त निशाचरी ने रोका,श्री हनुमान जी ने उसको भी मुष्ठी प्रहार द्वारा लहूलुहान कर सर्वगवासी कर दिया।
९६. श्री हनुमान ने राक्षसों की नगरी में धर्म चिन्ह को घर पर देखकर उसके घर के स्वामी से मिले तथा उनका परिचय जाना।उस घर के स्वामी विभीषण थे तथा उन्होंने ही माता सीता का पता बताया।
९७. श्रीराम ने खोज के लिये आते समय श्री हनुमान को अपनी मुद्रिका दी थी उस मुद्रिका को सीता माता के सम्मुख श्रीहनुमान ने डालकर अपना परिचय बताया ।
९८. माता सीता की आज्ञा लेकर अशोक वाटिका को फलों के बाग को तोड़ने के कारण रक्षा के लिये आये हुये सभी राक्षसों ,सेनापतियों के साथ साथ प्रहस्त पुत्र जम्बूमाली,रावण के पुत्र अक्षकुमार का वध किया।
९९. रावण पुत्र मेघनाद श्री हनुमान को ब्रह्मास्त्र में बांधकर रावण के सम्मुख ले गया।
१००. विभीषण आदि के नीति विरुद्ध दूत को मारने से मना करने पर इसकी पूँछ में आग लगाने का निर्णय रावण ने किया
🌸हरे राम हरे राम राम-राम हरे हरे 🌸
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