जम्बूद्वीप
हमारी तमाम धार्मिक कथाओं में जम्बू द्वीप का वर्णन मिलता है।
हमारे कथावाचक पुरोहित मंत्र पढ़ते हैं तो "जम्बूद्वीपे भारतखंडे" का उल्लेख करते हैं।
आज भारत का जो भूगोल है उसमें समझ पाना मुश्किल होता है कि यह जम्बूद्वीप क्या है और भारत इसमें कहां है।
पौराणिक इतिहास से शायद यह समझ पाना संभव होगा।
प्रस्तुत संकलित लेख इसी जिज्ञासा को स्पष्ट करता है।
रामायण में जिस सुमेरू पर्वत समेत अन्य पर्वतों का उल्लेख है वह भी इसमें वर्णित है।
•जम्बू द्वीप में कहां था सुमेरू पर्वत?
जम्बू द्वीप के आसपास 6 द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर.
जम्बू द्वीप धरती के मध्य में स्थित है और इसके मध्य में इलावृत नामक देश है। आज के कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया और चीन के मध्य के स्थान को इलावृत कहते हैं। इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत। इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस), उत्तर में रम्यकवर्ष (रूस), हिरण्यमयवर्ष (रूस) और उत्तकुरुवर्ष (रूस) नामक देश हैं। मिस्र, सऊदी अरब, ईरान, इराक, इसराइल, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन, बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, हिन्दुस्थान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का संपूर्ण क्षेत्र जम्बू द्वीप था।
इलावृत देश के मध्य में स्थित सुमेरू पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है और पश्चिम में केतुमालवर्ष है।
इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है।
इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ, दक्षिण की ओर गंधमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर
की ओर नंदन कानन नामक वन हैं, जहां अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस मानसरोवर)- ये चार सरोवर हैं।
माना जाता है कि नंदन कानन का क्षेत्र ही इंद्र का लोक था जिसे देवलोक भी कहा जाता है।
महाभारत में इंद्र के नंदन कानन में रहने का उल्लेख मिलता है।
सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का
प्रतिनिधित्व करते हैं।
सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देश में स्थित हैं। इस सुमेरू पर्वत को प्रमुख रूप से बहुत दूर तक फैले 4 पर्वतों ने घेर रखा है।
1. पूर्व में मंदराचल,
2. दक्षिण में गंधमादन,
3. पश्चिम में विपुल और
4. उत्तर में सुपार्श्व।
इन पर्वतों की सीमा इलावृत के बाहर तक है। सुमेरू के पूर्व में शीताम्भ, कुमुद, कुररी, माल्यवान, वैवंक नाम से आदि पर्वत हैं।
सुमेरू के दक्षिण में त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि पर्वत हैं।
सुमेरू के उत्तर में शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग और कालंज आदि पर्वत हैं।
अन्य पर्वत :- माल्यवान तथा गंधमादन पर्वत उत्तर तथा दक्षिण की ओर नीलांचल तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं।
उन दोनों के बीच कर्णिकाकार मेरू पर्वत स्थित है।मर्यादा पर्वतों के बाहरी भाग में भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष नामक देश सुमेरू के पत्तों के समान हैं।
जठर और देवकूट दोनों मर्यादा पर्वत हैं, जो उत्तर और दक्षिण की ओर नील तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं।
पूर्व तथा पश्चिम की ओर गंधमादन तथा कैलाश पर्वत फैला है।
इसी समान सुमेरू के पश्चिम में भी निषध और पारियात्र- दो मर्यादा पर्वत स्थित हैं।
उत्तर की ओर निश्रृंग और जारुधि नामक वर्ष पर्वत हैं।
ये दोनों पश्चिम तथा पूर्व की ओर समुद्र के गर्भ में स्थित हैं।
गंगा की नदियां :- माना जाता है कि सुमेरू के ऊपर अंतरिक्ष में ब्रह्माजी का लोक है जिसके आस-पास
इंद्रादि लोकपालों की 8 नगरियां बसी हैं।
गंगा नदी चंद्रमंडल को चारों ओर से आप्लावित करती हुई बहती हैं।
संदर्भ : हिन्दू ग्रंथ विष्णु पुराण,
जैन ग्रंथ 'जंबूद्वीप्प्रज्ञप्ति'
जम्बू द्वीप से भारतवर्ष, हिन्दुस्थान बनने की
कहानी :-
जम्बू द्वीप से छोटा है भारतवर्ष।
भारतवर्ष में ही आर्यावर्त स्थित था।
आज न जम्बू द्वीप है न भारतवर्ष और न आर्यावर्त।
आज सिर्फ हिन्दुस्थान है और सच कहें तो यह भी नहीं।
क्या कारण हैं कि वेदों को मानने वाले लोग अब अपने ही देश में दर-बदर हैं ?
वह लोग जिनके कारण ही दुनियाभर के धर्मों और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई, वह लोग जिनके कारण दुनिया को ज्ञान, विज्ञान, योग, ध्यान और तत्व ज्ञान मिला।
''सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं
सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।
-वेदव्यास,भीष्म पर्व, महाभारत.
हिन्दी अर्थ :- हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भांति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष
दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों में पिप्पल और दो अंशों में महान शश (खरगोश) दिखाई देता है।
पहले संपूर्ण हिन्दू जाति जम्बू द्वीप पर शासन करती थी।
फिर उसका शासन घटकर भारतवर्ष तक सीमित हो गया। फिर कुरुओं और पुरुओं की लड़ाई के बाद आर्यावर्त नामक एक नए क्षेत्र का जन्म हुआ। जिसमें आज के हिन्दुस्थान के कुछ हिस्से, संपूर्ण पाकिस्तान और संपूर्ण अफगानिस्तान का क्षेत्र था।
लेकिन लगातार आक्रमण, धर्मांतरण और युद्ध के चलते अब घटते-घटते सिर्फ हिन्दुस्थान बचा है।
यह कहना सही नहीं होगा कि पहले हिन्दुस्थान का नाम भारतवर्ष था और उसके भी पूर्व जम्बू द्वीप था।
कहना यह चाहिए कि आज जिसका नाम हिन्दुस्थान है वह भारतवर्ष का एक टुकड़ा मात्र है।
जिसे आर्यावर्त कहते हैं वह भी भारतवर्ष का एक हिस्सा भर है और जिसे भारतवर्ष कहते हैं वह तो
जम्बू द्वीप का एक हिस्सा है मात्र है।
जम्बू द्वीप में पहले देव-असुर और फिर बहुत बाद में कुरुवंश और पुरुवंश की लड़ाई और विचारधाराओं के टकराव के चलते यह जम्बू द्वीप कई भागों में बंटता चला गया।
धरती के सात द्वीप :- पुराणों और वेदों के अनुसार धरती के सात द्वीप थे- जम्बू,प्लक्ष,शाल्मली,कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर।
इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है।
'जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंपुरुषं स्मृतम्,
हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विज।
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्,
उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्,
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।
एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव:
जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।-
-(विष्णु पुराण)
जम्बू द्वीप का वर्णन-
जम्बू द्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है।
जम्बू द्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।
जम्बू द्वीप का विस्तार-
जम्बू दीप : सम्पूर्ण एशिया, भारतवर्ष : पारस (ईरान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्थान, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका,मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, लाओस तक भारतवर्ष।
आर्यावर्त-
बहुत से लोग भारतवर्ष को ही आर्यावर्त मानते हैं जबकि यह भारत का एक हिस्सा मात्र था।
वेदों में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा गया है।
आर्यावर्त का अर्थ आर्यों का निवास स्थान।
आर्यभूमि का विस्तार काबुल की कुंभा नदी से भारत की गंगा नदी तक था।
ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को 'सप्तसिंधु' प्रदेश कहा गया है।
ऋग्वेद के नदीसूक्त (10/75) में आर्यनिवास में प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन मिलता है,
जो मुख्य हैं:- कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी(रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता(झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा।
उक्त संपूर्ण नदियों के आसपास और इसके विस्तार क्षेत्र तक आर्य रहते थे।
वेद और महाभारत को छोड़कर अन्य ग्रंथों में जो आर्यावर्त का वर्णन मिलता है वह भ्रम पैदा करने वाला है, क्योंकि आर्यों का निवास स्थान हर काल में फैलता और सिकुड़ता गया था इसलिए उसकी सीमा क्षेत्र का निर्धारण अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलता है।
मूलत: जो प्रारंभ में था वही सत्य है।
''हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते॥
-(बृहस्पति आगम)
अर्थात :- हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।
जयति पुण्य सनातन संस्कृति
जयति पुण्य भूमि भारत
जयतु जयतु हिंदुराष्ट्रं
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