नागा साधु एक रहस्य :-
सभी नागाओं साधुओं में नागा साधुओं को सबसे अधिक हैरत और आश्चर्य से देखा जाता है यह आम जनता के बीच एक और कोतुहल का विषय होते हैं । समाज सोचता हैं कि नागा साधु बनाना बहुत आसान होता है तो आपकी है सोच बिल्कुल गलत है। नागा साधु की ट्रेनिंग सेना के कमांडो की ट्रेनिंग से भी ज्यादा कठिन होती है। उन्हें दीक्षा लेने से पूर्व खुद का पिंडदान और साथ तर्पण करना पड़ता है।
पुराने समय में अखाड़ों में नाग साधु को मठों की रक्षा के लिए एक योद्धा की तरह तैयार किया जाता था आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि मठों और मंदिरों की रक्षा के लिए इतिहास में नाग साधुओं ने कई लड़ाइयां भी लड़ी हैं। आज मै आपको नागा साधुओं के बारे में उनके इतिहास से लेकर उनके दीक्षा तक सबकुछ विस्तारपूर्वक बताऊंगा।
वर्तमान में भारत में नागा साधु के कई प्रमुख अखाड़े हैं वैसे तो अखाड़े में दीक्षा के कुछ अपने नियम होते हैं लेकिन कुछ कायदे ऐसे भी होते हैं जो सभी दशनामी अखाड़े में एक जैसे होते हैं।
ब्रह्मचर्य का पालन :- कोई भी आम आदमी जब नागा साधु बनने के लिए आता है तो सबसे पहले उसके स्वयं पर नियंत्रण की स्थिति को परखा जाता है। उससे लंबे समय ब्रह्मचर्य का पालन करवाया जाता है इस प्रक्रिया में दैहिक प्रक्रिया ही नहीं वरन मानसिक नियंत्रण को भी परखा जाता है अचानक किसी को दीक्षा नहीं दी जाती पहले यह तय किया जाता है कि दीक्षा लेने वाला पूरी तरह से वासना वृक्षों से मुक्त हो चुका है अथवा नहीं।
सेवा कार्य :- ब्रह्मचर्य व्रत के साथ ही दीक्षा लेने वाले के मन में सेवा भाव होना भी आवश्यक है यह माना जाता है कि जो भी साधु बन रहा है वह धर्म राष्ट्र और मानव समाज की सेवा रक्षा के लिए बन रहा है! ऐसे में कई बार दीक्षा लेने वाले साधु को अपने गुरु और वरिष्ठ साधुओं की सेवा भी करनी पड़ती है दीक्षा के समय ब्रह्मचार्य की अवस्था प्राय 17 से 18 से कम की नहीं रहा करती और वह ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य वर्ण के ही हुआ करते हैं।
खुद का पिंडदान और श्राद्ध :- दीक्षा के पहले जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है वह खुद का श्राद्ध और पिंडदान करना! इस प्रक्रिया में साधक स्वयं को अपने परिवार और समाज के लिए मृत मान कर अपने हाथों से अपना श्राद्ध कर्म करना पड़ता है इसके बाद ही उसे गुरु द्वारा नया नाम और नई पहचान दी जाती है।
वस्त्रों का त्याग :- नागा साधु को वस्त्र धारण करने की भी अनुमति नहीं होती अगर वस्त्र धारण करने हो तो सिर्फ गहरे रंग के वस्त्र नागा साधु पहन सकते हैं! फिर भी सिर्फ एक वस्त्र इससे अधिक गेरुआ वस्त्र नागा साधु धारण नहीं कर सकते। नागा साधुओं को शरीर पर मात्र भस्म लगाने की अनुमति होती है। भस्म का ही श्रृंगार किया जाता है।
भस्म और रुद्राक्ष :- नागा साधुओं को विभूति एवं रुद्राक्ष धारण करना पड़ता है शिखा सूत्र चोटी का परित्याग करना होता है! नागा साधु का अपने सारे बालों का त्याग करना होता है वह सिर पर शिखा भी नहीं रख सकता या फिर संपूर्ण जटा को धारण करना होता है!
एक समय भोजन :- नागा साधुओं को रात और दिन मिलाकर केवल एक ही समय भोजन करना होता है वह भोजन में भिक्षा मांग कर लिया गया होता है! एक नागा साधु को अधिक से अधिक ७ घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है,यदि ७ घरों से कोई भिक्षा ना मिले तो उसे भूखा रहना पड़ता है जो खाना मिले उसमें पसंद नापसंद को नजरअंदाज करके प्रेम पूर्वक ग्रहण करना होता है।
केवल पृथ्वी पर ही सोना :- नागा साधु सोने के लिए पलंग खाट या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं कर सकता! यहां तक कि नागा साधुओं को गद्दी पर सोने की भी मनाही होती है नागा साधु केवल पृथ्वी पर ही सोते हैं यह बहुत ही कठोर नियम है जिसका पालन हर नागा साधु को करना ही पड़ता है!
मंत्र में आस्था :- दीक्षा के बाद गुरु से मिले गुरु मंत्र में ही उसे संपूर्ण आस्था रखनी होती है उसकी भविष्य की सारी तपस्या इसी गुरु मंत्र पर निर्धारित होती है।
अन्य नियम :- बस्ती से बाहर निवास करना किसी को प्रणाम न करना और ना किसी की निंदा करना तथा केवल सन्यासी को ही प्रणाम करना आदि कुछ और नियम है जो दीक्षा लेने वाले हर नागा साधु को पालन करना पड़ते हैं! नाग साधु बनने के लिए इतनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है कि शायद कोई आम आदमी इन्हे पार कर पाये। नागाओं को सेना की तरह तैयार किया जाता है उनको आम दुनिया से अलग और विशेष बनाना होता है इस प्रक्रिया में सालों लग जाते हैं।
तहकीकात :- जब भी कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता अखाड़ा अपने स्तर पर यह तहकीकात करता है कि वह साधु क्यों बनना चाहता है? उस व्यक्ति की तथा उसके परिवार की संपूर्ण पृष्ठ भूमि देखी जाती है, अगर अखाड़े को यह लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है तो ही उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है! अखाड़े में प्रवेश के बाद उसके ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है इसमें 6 महीने से लेकर 12 साल तक लग जाते हैं। अगर अखाड़ा और उस अखाडे के गुरू यह निश्चित कर ले कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है।
महापुरुष :- अगर व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा से सफलतापूर्वक गुजर जाता है तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है उसके पांच गुरू बनाए जाते हैं जो पांच गुरू पंचदेव या पंच परमेश्वर शिव विष्णु शक्ति सूर्य और गणेश होते हैं! उन्हें भस्म भगवा रुद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं। यह नागाओं के प्रतीक और आभूषण होते हैं।
अवधूत :- महापुरुष के बाद नागाओं को अवधूत बनाया जाता है,जिसमे सबसे पहले अपने बाल कटवाने होते हैं इसके लिए अखाड़ा परिषद की रसीद नहीं कटती है। अवधूत रूप में भिक्षा लेने वाले को खुद का तर्पण और पिंडदान करना होता है यह मुंडन अखाड़े के पुरोहित करवाते हैं। ये संसार और परिवार के लिए उन्नत हो जाते हैं इनका एक ही उद्देश्य होता है सनातन और वैदिक धर्म की रक्षा।
लिंग भंग :- इस प्रक्रिया के रूप में अखाड़े के नीचे बिना कुछ खाए पीए खड़ा होना पड़ता है, इस दौरान उनके कंधे पर एक दंड और हाथों में मिट्टी का बर्तन होता है! इस दौरान अखाड़े के पहरेदार उन पर नजर रखे होते हैं इसके बाद अखाड़े के साधुओं द्वारा वैदिक मंत्रों के साथ उनके लिंग को झटके देकर निष्क्रिय किया जाता है यह कार्य भी अखाड़े के ध्वज के निचे किया जाता है इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है।
नागाओं के पद और अधिकार :- नागा साधुओं के कई पद होते हैं, एक बार नागा साधु बनने के बाद उसके पदाधिकारी बनाते हैं! नागा साधु के बाद महंत, श्री महंत, जमातिया महंत, थानापति महंत, पीर महंत, दिगंबर श्री, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर जैसे पदों तक जा सकता है।। वर्तमान में कई आंकड़ों में महिलाओं को भी नागा साधु की दीक्षा दी जाती है उनमें विदेशी महिलाओं की संख्या भी काफी है वैसे तो महिला नागा साधु और साधु के नियम कायदे समान ही है।
अंतर केवल इतना ही है कि महिला नागा साधु को एक पीला वस्त्र लपेटकर रखना पड़ता है वहीं वस्त्र पहनकर स्नान करना पड़ता है ,नग्न स्नान की अनुमति नहीं है। यहां तक कि कुंभ मेले में भी नहीं। सिर्फ महिलाओं को ही श्रंगार नहीं होता नागाओं को भी ऋंगार करना अच्छा लगता है। अंतर सिर्फ इतना है कि नागाओं की श्रृंगार सामग्री महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधनों से बिल्कुल भिन्न होती है। उन्हें भी अपने रखरखाव की इतनी ही चिंता होती है जितनी आम आदमी को।
भस्म :- नागा साधुओं को सबसे ज्यादा प्रयोग होती है भस्म! भगवान महादेव के औघड़ रूप से भस्म रमाना सभी जानते हैं। ऐसे ही शैव संप्रदाय के साधु भी अपने आराध्य के प्रति भस्म को अपने शरीर पर लगाते हैं। प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद नागा साधु सबसे पहले अपने शरीर पर भस्म आते हैं यह भस्म ताजी होती है वस्त्र का काम करती है।
पुष्प :- कई नागा साधु नियमित रूप से पुष्पों की माला धारण करते हैं इसमें गेंदे के फूल सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं! इसके पीछे कारण है गेंदे के फूलों का अधिक समय तक ताजे बने रहना है। नागा साधु गले में हाथों पर और विशेष तौर से अपनी जटाओं में फूल लगाते हैं हालांकि कई साधु अपने आप को फूलों से बचाते भी हैं यह निजी पसंद और विश्वास का विषय है।
तिलक :- नागा साधु सबसे ज्यादा ध्यान अपने तिलक पर देते हैं! यह पहचान और शक्ति दोनों का प्रतीक है रोज तिलक एक जैसा लगे इस बात को लेकर नागा साधु बहुत सावधान रहते हैं! यह कभी अपने तिलक की शैली को बदलते नहीं है! तिलक लगाने में इतनी बारीकी से काम करते हैं कि अच्छे-अच्छे मेकअप मैन मात खा जाएं!
रुद्राक्ष :- भस्म की तरह नागाओं को रुद्राक्ष भी बहुत प्रिय है। कहा जाता है रुद्राक्ष भगवान महादेव के आंसुओं से उत्पन्न हुए हैं। यह साक्षात भगवान शिव के प्रतीक हैं इस कारण लगभग सभी नागा साधु रुद्राक्ष की माला पहनते हैं। यह मालाएं नागाओं के लिए आभामंडल जैसा वातावरण पैदा करती हैं! कहते हैं कि अगर कोई नागा साधु किसी पर खुश होकर अपनी माला उसे दे दे तो उस व्यक्ति के वारे न्यारे हो जाते हैं!
लंगोट :- आमतौर पर नागा साधु निर्वस्त्र ही होते हैं लेकिन कई नागा साधु लंगोट धारण भी करते हैं इसके पीछे कई कारण है जैसे भक्तों के उनके पास आने में कोई झिझक ना रहे ,कोई साधु हठयोग के तहत भी लंगोट धारण करते हैं। जैसे लोहे की लंगोट, चांदी की लंगोट, लकड़ी की लंगोट यह भी एक तप की तरह होता है।
शस्त्र:- नागाओं को केवल साधु नहीं बल्कि योद्धा माना गया है। वे युद्ध कला में माहिर क्रोधी और बलवान शरीर के स्वामी होते हैं। अक्सर नागा साधु अपने साथ तलवार, परसा त्रिशूल लेकर चलते हैं। यह हथियार इनके योद्धा होने के प्रमाण तो है ही साथ ही इनकी भव्यता का हिस्सा भी है।
चिमटा :- नागाओं में चिमटा रखना अनिवार्य होता है धूनी रमाने में सबसे ज्यादा काम चिमटे का ही पड़ता है। चिमटा हथियार भी है और औजार भी। यह नागाओं के व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा होता है। ऐसा उल्लेख भी कई जगह मिलता है कि कई साधु चिमटे से ही अपने भक्तों को आशीर्वाद भी देते हैं । महाराज का चिमटा यदि किसी को लग जाए तो नैया पार हो जाए।
रत्न :- कई नागा साधु रत्नों की माला भी धारण करते हैं! महंगे रत्न जैसे मूंगा पुखराज मणिका दी रत्नों की माला धारण करने वाले नागा कम ही होते हैं! उन्हें धन से मोह नहीं होता लेकिन यह उनके सिंगार का आवश्यक हिस्सा होते हैं।
जटा :- जटा नागा साधु की सबसे बड़ी पहचान होती है! मोटी मोटी जटाओं की देखरेख भी उतने ही जतन से की जाती है! काली मिट्टी से उन्हें धोया जाता है सूर्य की रोशनी में सुखाया जाता है अपनी जटाओं के नागा सजाते भी हैं, कुछ फूलों से कुछ रुद्राक्ष उसे तो कुछ अन्य मोतियों की माला उसे जटाओं का श्रृंगार करते हैं!
दाढ़ी :- जटा की तरह दाढ़ी भी नागा साधुओं की पहचान होती है इसकी देखरेख भी जटा की तरह ही होती है नागा साधु अपनी दाढ़ी को भी पूरे जतन से शुद्ध रखते हैं!
पोशाक चर्म :- जिस तरह भगवान महादेव बाग अंबर यानी शेर को खाल को वस्तु के रूप में पहनते हैं वैसे ही कई नागा साधु जानवरों की खाल पहनते हैं जैसे हिरण या शेर। हालांकि शिकार और पशु खाल पर लगे कड़े कानूनों के कारण अब पशुओं की खाल मिलना मुश्किल होती है फिर भी कई साधु के पास जानवर की खाल देखी जा सकती है।
भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आदि गुरु शंकराचार्य ने रखी थी शंकर का जन्म आठवीं शताब्दी, के मध्य में हुआ था , जिसे कुछ लोग ५०० ईसा पूर्व भी मानते है। भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बहुत बेहतर नहीं थी भारत की धन संपदा से खींचे तमाम आक्रमणकारी यहां आ रहे थे कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य सभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति व्यवस्था बाधित थी।
ईश्वर धर्म धर्म शास्त्रों को तर्कशास्त्र और शास्त्र सभी तरह के चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था ऐसे में शंकराचार्य सनातन धर्म की स्थापना के लिए कई कदम उठाया जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों का निर्माण करना। यह थी, गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ द्वारिका पीठ और ज्योर्तिमठ पीठ। इसके अलावा आदि गुरु ने मठों मंदिरों की संपत्ति को लूटने वाले और श्रद्धालुओं को सताने वालों का मुकाबला करने के लिए सनातन धर्म के लिए विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखा के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरुआत की।
आदि गुरु शंकराचार्य को लगने लगा था सामाजिक उथल-पुथल के इस युग में केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को सुंदर बनाएं और हथियार चलाने में कुशलता हासिल करें। इसलिए ऐसे मठ बने जहां इस तरह के व्यायाम या सत्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा।
आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उस जगह को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांव पेच सीखते हैं कालांतर में तैयार अखाड़े अस्तित्व में आए हैं। शंकराचार्य ने आंकड़ों को सुझाव दिया कि मठ मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर शक्ति का प्रयोग करें। इस तरह ब्राह्मणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक सुरक्षा कवच का काम किया। कई बार स्थानीय राजा महाराज विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं का सहयोग लिया करते थे।
इतिहास में ऐसे कई गौरवपूर्ण युद्ध का वर्णन मिलता है जिनमें 40000 से ज्यादा नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा वृंदावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने उसकी सेना का मुकाबला करके गोकुल की रक्षा की थी।
भारत की आजादी के बाद इन अखाड़ों ने अपना सैनिक चरित्र त्याग दिया इन अखाड़ों के प्रमुख ने जोर दिया कि उनके अनुयाई भारतीय संस्कृति और दर्शन के सनातनी मूल्यों का अध्ययन और अनुपालन करते हुए संयमित जीवन व्यतीत करें।
प्रमुख अखाड़े जिनपर मठासीन होते हैं इन प्रमुख अखाड़ों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :-
श्री निरंजनी अखाड़ा :- ये अखाड़ा 826 ईसवी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ था। इनके इष्ट देव भगवान महादेव के पुत्र कार्तिक स्वामी है। इनमें दिगंबर साधु महंत व महामंडलेश्वर होते हैं इनकी शाखाएं इलाहाबाद उज्जैन हरिद्वार त्रंबकेश्वर व उदयपुर में हैं।
श्री जूनादत्त या जूना अखाड़ा :- यह अखाड़ा 1145 में उत्तराखंड के कर्ण प्रयाग में स्थापित हुआ इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं इनके इष्टदेव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं इसका केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है हरिद्वार में माया देवी मंदिर के पास इनका आश्रम है इस अखाड़े के नागा साधु जब शाही स्नान के लिए संगम की ओर बढ़ते हैं तो मेले में आए श्रद्धालुओं को समेत पूरी दुनिया की सांसे उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए रुक जाती हैं
श्री अटल अखाड़ा :- यह अखाड़ा 569 ईसवी में गोंडवाना क्षेत्र में स्थापित किया गया इनके इष्ट देव भगवान गणेश है यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है इसके मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल हरिद्वार इलाहाबाद उज्जैन व त्रंबकेश्वर में भी है।
श्री आह्वान अखाड़ा :- यह अखाड़ा 646 में स्थापित हुआ और 1603 में पुनर संयोजित किया गया इसके इष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन है। इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है इसका आश्रम ऋषिकेश में भी है। स्वामी अनूप गिरी और उमराव गिरी इस अखाड़े के प्रमुख संतो में से हैं।
श्री आनंद अखाड़ा :- यह अखाड़ा 855 इस्वी में मध्यप्रदेश के विरार में स्थापित हुआ था इसका केंद्र वाराणसी में है इसकी शाखाएं इलाहाबाद हरिद्वार उज्जैन में भी हैं।
श्री पंचाग्नि अखाड़ा :- इस अखाड़े की स्थापना 1136 में हुई थी इसकी इस देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी हैं इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य ब्रह्मचारी साधु के महामंडलेश्वर शामिल हैं! परंपरा अनुसार इन की शाखाएं इलाहाबाद हरिद्वार उज्जैन में त्रंबकेश्वर में है।
श्री नाग पंथी गोरखनाथ अखाड़ा :- यह अखाड़ा ईस्वी 866 में अहिल्या गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ इनके संस्थापक तीर्थ सोमनाथ जी हैं इनका मुख्य रावत गोरखनाथ है, और इनमें 12 पंथ हैं! यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है। और इनकी त्रंबकेश्वर शाखा त्रयंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है।
श्री वैष्णव अखाड़ा :- यह बाल आनंद अखाड़ा ईश्वी 1595 दारागंज में श्री मध्य मुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही निर्वाणी खाकी आदि 3 संप्रदाय बने। इन का अखाड़ा त्रंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था 1848 तक शाही स्नान त्रंबकेश्वर में ही हुआ करता था। परंतु 1848 में शैव वैष्णव सालों में पहली स्नान कौन करें इस मुद्दे पर झगड़े हुए श्रीमंत पेशवा जी ने झगड़ा निपटाया। उस समय उन्होंने त्रंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्था पर स्नान किया 1932 में नासिक में स्नान करने लगे आज भी है स्नान नासिक नहीं होता है।
श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा :- इस संप्रदाय के संस्थापक भी श्री चंद्र आचार्य उदासीन हैं इसमें सांप्रदायिक भेद है! इनमें उदासीन साधु महंत वह महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग हरिद्वार उज्जैन त्रंबकेश्वर भदैनी कनखल साहिबगंज मुल्तान नेपाल में मद्रास में है।
श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा :- यह अखाड़ा 1784 में स्थापित हुआ 1784 में हरिद्वार कुंभ मेले के समय एक बड़ी सभा में विचार विनिमय करके श्री दुर्गा सिंह महाराज ने इसकी स्थापना की! इनकी इष्ट पुस्तक श्री गुरु ग्रंथ साहिब है। इसमें संप्रदायिक साधु महंत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है इनकी शाखाएं प्रयाग हरिद्वार उज्जैन त्रंबकेश्वर में है।
निर्मोही अखाड़ा :- निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 में रामानंद आचार्य ने की थी! इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश उत्तराखंड मध्य प्रदेश राजस्थान गुजरात और बिहार में है पुराने समय में इस के अनुयायियों की तीरंदाजी और तलवारबाजी की दीक्षा भी दिलाई जाती थी।
किन्नर अखाडा :- किन्नर अखाड़ा (हिजड़ा समुदाय) द्वारा 2018 में स्थापित एक अखाड़ा (हिंदू धार्मिक आदेश) है। यह जूना अखाडा (श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा) के अधीन है।[ इस संगठन ने 2019 कुंभ मेले में अपना प्रदर्शन किया।


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