"सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत"
हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड़-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है।
सेवा धर्म परम गहनो योगिनामप्यगम्यः
सिर भरि जाउँ उचित अस मोरा।
सबते सेवक धरम कठोरा।।
-भरत जी, की चित्रकूट यात्रा में अभिब्यक्ति।
तुम मुझे विश्वास दो, मैं तुम्हें भगवान दूँगा।
तुम मुझे अभिमान दो, मैं तुम्हें हनुमान दूँगा।।
अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। और अहंकार पर विजय पाने का सर्वश्रेष्ट शस्त्र है,सेवा धर्म।इसीलिए भगवान राम की सेवा करके निरहंकारिता को जनमानस के हृदय में सुस्थापित करने के लिए ही भगवान शिव ने रामावतार में हनुमानजी के रूप में अवतार लिया।
जानि राम सेवा सरस, समुझि करब अनुमान।
पुरुषा ते सेवक भये, हर ते भे हनुमान।।
मिलन के पश्चात विभीषण ने, हनुमानजी से पूछा कि आप अपना परिचय दीजिए कि आप कौन हैं?
और फिर कहा कि, मुझे तो लगता है कि आप या तो महान संत हैं, या साक्षात् प्रभुश्रीराम हैं। तो हनुमानजी तो महानतम संत होने के साथ साथ पवन-पुत्र हैं।
पवन का स्वभाव तो आप जानते ही हैं कि पवन में जैसा दिब्य कर्मयोग है,वस्तुतः वही कर्मयोग की परिभाषा है, वही कर्मयोग का आदर्श है। आप देखें व्यक्ति को जीवन में सबसे अधिक सेवा किसकी चाहिए? किसकी आवश्यकता है?
तो, आपको लगेगा कि, पवन की, हवा की। यों तो पृथ्वी की भी सेवा चाहिए, क्योंकि अन्न के बिना ब्यक्ति भुखों मर जायेगा।
अगर जल न मिले, तो प्यासा मर जायेगा। लेकिन ब्यक्ति को भोजन चाहिए, दिन में तीन बार, जल चाहिए दो चार बार, लेकिन ब्यक्ति को एक क्षण के लिए भी जिस वस्तु का अभाव सह्य नहीं है, वह हवा है। वायु है।
और सबसे अधिक सस्ती वस्तु क्या है? देखें -अन्न का दाम ज्यादा, जल का दाम और कम और हवा का दाम विल्कुल ही नहीं। तो यह तो उल्टा हो गया। जो जितना जरूरी है, उसका दाम, उतना ही कम हो गया। प्रभु की कितनी बड़ी कृपा है।,
इसका स्पष्ट एक कारण तो यह है कि मूल्य का सिद्धान्त, वस्तु की उपयोगिता से संबंधित नहीं है, बल्कि वस्तु की दुर्लभता से संबंधित है। जिस वस्तु का जितना दाम बढ़ाना हो, वह वस्तु उतनी ही दुर्लभ बना दी जाती है।हीरा, कठिनता से मिलता है और अन्न सरलता से तो हीरे की तुलना में अन्न का दाम कम। अन्न की तुलना में जल का दाम कम और जल की तुलना में, बिना प्रयास के मिलने वाली हवा का दाम बिल्कुल नहीं। तो पवन देवता भी अगर अपनी कीमत बढ़ाना चाहते,तो घंटे दो घंटे रुक कर लोगों की बेचैनी बढ़ने का इन्तजार करते।
एक बार पवन देवता ने अपनी करामात दिखाई थी। जब हनुमानजी को इन्द्र ने मूर्छित कर दिया था। उन्होंने ज्यों ही एक क्षण के लिए अपनी गति का अवरोध किया,सारे
संसार में लोग त्राहि त्राहि कर उठे। पवन देवता ने कहा,इन्द्र! हम अपना मूल्य न दिखाते, पर तुमने बिना सोचे समझे मेरे पुत्र पर बज्र-प्रहार कर दिया है,इसलिए हम सबको बताना चाहते हैं कि हम सुलभ तो हैं, पर हमारे बिना एक क्षण भी जीवन नहीं है।
तो पवन देवता कौन हैं? जो कर्म का दाम नहीं चाहते हैं।निष्काम कर्मयोग। क्योंकि जहाँ पर कर्म है, वहाँ पर कामना है। और गीता के अनुसार क्रिया और पदार्थ संश्लिष्ट, इस जड़ संसार में कामना ही सबसे बड़ा पाप है, कामना ही सबसे बड़ा बंधन है। पर पवन की विशेषता यह है कि पवन में कर्म है, किन्तु कामना का सर्वथा अभाव है। वे बदले में कुछ नहीं चाहते।
और इतना ही नहीं,कर्म में दो वस्तुएँ हमेशा देखी जाती हैं।एक तो कर्तब्य और दूसरा अन्त में फल। पहले तो मन में यह कर्तृत्व आता है कि मैं यह कर्म करने वाला हूँ,और
कर्म करने के बाद फिर फल पाने की इच्छा होती है। पवन में यह दोनों ही नहीं है।
न कर्तृत्व है,न कर्म फलाकांछा। पवन देव में कर्तृत्व का इतना अभाव है कि, आँखों से पृथ्वी दिखाई देती है, जल दिखाई देता है,अग्नि दिखाई देती है,लेकिन जिस हवा की आवश्यकता हमें और आपको चौबीसों घंटे रहती है,वह हमें एक क्षण के लिए भी आँखों से दिखाई नहीं देती।
इसका अभिप्राय क्या है? कि पवन देवता, चाहते हैं कि लोगों की सेवा हो जाय और सेवा करने वाला दिखाई भी न दे। तो न तो उनमें कर्तृत्व है,न कर्म-फलाकांछा।
इसके साथ पवन की एक विशेषता और भी है, कि पवन में आत्म विज्ञापन बिल्कुल नहीं है। आत्म-प्रशंसा,आत्म प्रचार,आत्म विज्ञापन हमारे समाज में आम बात है। पवन देवता किसका प्रचार करते हैं कि आप जानते हैं कि वे जिधर से बह करके आते हैं, वहाँ से यदि कुछ दूरी पर सुन्दर बाटिका लगी हुई है,और उसमें सुगन्धित पुष्प खिले हुए हों, तो पवन देवता जब आयेंगे तो उस बाटिका के फूल की सुगंध को लेते आएँगे।
फूल के पास आपको पहुँचना नहीं पड़ा, पर पवन देवता ने फूल की सुगंध को पहुँचा दिया। और जब आपकी
नासिका के पास, उस फूल की सुगंध पहुँचती है, तो आपको पवन की याद नहीं आती, बल्कि आपका ध्यान तुरंत चला जाता है कि अरे! पास में कहीं रजनीगंधा है क्या? पास में कहीं गुलाब है क्या? पास में कहीं चम्पा है क्या?
हनुमानजी तो पवन पुत्र हैं। इनमें भी न कर्म फलाकांछा है, न कर्तृत्व है, और न ही आत्म विज्ञापन है। हनुमानजी ने कर्मफल की कभी इच्छा नहीं की, वे निरंतर सेवा में लगे रहे। एक बार हनुमानजी की सेवा देखकर, भक्तों के मन में आया कि प्रभु की सारी सेवा तो यही कर डालते हैं, कुछ हमारे लिए छोड़ते ही नहीं।
सबने भगवान से कहा-महाराज! सेवा का बँटवारा कर दिया जाय। लक्ष्मणजी और भरतजी ने सारी सेवा बाँट ली, और हनुमानजी का कहीं नाम ही नहीं रक्खा। जब भगवान ने इसके संबंध में पूँछा, तो उन लोगों ने कहा, बहुत दिनों तक इन्होंने आपकी सेवा कर ली है। अब कोई सेवा बची ही नहीं है। जब प्रभु ने हनुमानजी की तरफ मुस्कराकर देखा, तो हनुमानजी ने उस सेवा की सूची माँगी।
भरतजी व लक्ष्मण जी की पैनी दृष्टि से बनी सूची को देखकर हनुमानजी ने कहा कि एक सेवा छूट गयी है। वही मेरी सेवा रहेगी। कौन सी सेवा? तो हनुमानजी ने कहा कि शास्त्र यह कहता है कि जब किसी को जम्हाई आवे, तो चुटकी बजाकर- दक्षक्रतुः -ऐसा कहना चाहिए।यह काम किसी ने नहीं लिया है, इसलिए यह काम मेरा रहेगा।
अब परिणाम क्या हुआ कि, और लोगों का काम तो अलग अलग समय में होता है, पर हनुमानजी तो चौबीसों घंटे साथ में क्यों कि जम्हाई का कोई समय तो है नहीं कि किस समय आएगी। प्रभु मुस्कराते हुए कहते हैं कि पवनपुत्र की यह सार्थकता तो है ही। और लोगों की अपेक्षा तो कभी कभी है, पर पवन की अपेक्षा तो चौबीसों घंटे है।
सभी भक्त हनुमानजी की विजय को स्वीकार करते हैं।यही हनुमानजी के सेवा-बृत्ति की विलक्षणता है। भगवान राम ने लंका से लौटने के बाद हनुमानजी से पूछ दिया कि यह बताओ तुमने लंका को कैसे जला डाला?हनुमानजी ने मुस्कुराकर पूछा प्रभु! आपने एक ही काम के विषय में पूछा। तो प्रभु ने पूछा तो बताओ और कौन कौन से काम तुमने किए?
हनुमानजी ने गिनाया :-
नाघि सिंधु हाटक पुर जारा।निसिचर गन बधि बिपिन उजारा।।
प्रभु ने कहा-इतने काम किए? बोले नहीं- सो सब तव प्रताप रघुराई।।
हनुमानजी के बोलने की कला पर ध्यान दीजिए।बोले मैंने कुछ नहीं किया है,सब आपका प्रताप है।कुछ बन्दर जो सुन रहे थे तो उनको हनुमानजी की बात अटपटी लगी। क्यों?
हनुमानजी ने काम गिनाते समय क्रम-भंग कर दिया।और क्रम भंग क्या?हनुमानजी कहते हैं-नाघि सिंधु-समुद्र लाँघा गया।फिर कहते हैं-हाटक पुर जारा-लंका जलाई गयी।
फिर कहते हैं कि-निसिचर मारे गये और तब बाग उजाड़ा गया। जबकि प्रत्येक पढ़ने वाला जानता है कि पहले वे समुद्र लाघते हैं, फिर बाग उजाड़ते हैं, फिर राक्षसों को मारते हैं, और अंत में लंका जलाते हैं। तो हनुमानजी को उसी क्रम में गिनना भी चाहिए था। पहले वाले काम को पहले व बाद वाले काम को बाद में गिनते।
बन्दरों को आश्चर्य हुआ,पर भगवान राम (चाहैं कीन करावैं सोई), हनुमानजी के संकेत को समझ गये।हनुमानजी ने कहा, हमारे मित्रों को यह उल्टी बात लग रही है,परन्तु मैं कहना चाहता हूँ कि मैंने यह कार्य इसलिए नहीं किया कि,प्रभु!आपने मुझे यह काम सौंपा ही नहीं था। आप मुझसे पूछते हैं कि हनुमान! तुमने लंका क्यों जलाया, और कैसे जलाया?
तो प्रभु! आपसे मेरी जिज्ञासा यह है कि आपने लंका जलाने का काम सौंपा था क्या? आपने तो सिर्फ मुझे इतना ही करने के लिए कहा था कि-
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु।
कहि बल बिरह बेगि तुम आएहु।।
और वही योजना लेकर मैं आपके आदेश से गया। लेकिन हनुमानजी का संकेत क्या था?
उन्होंने कहा कि महाराज! लोगों को लगता है कि लंका, बाग उजड़ने के बाद, राक्षसों के मरने के बाद जली, मैं दावे से कहता हूँ कि लंका पहले जल गयी और बाग बाद में उजड़ा, राक्षस बाद में मारे गये। क्योंकि उन्होंने कहा कि,प्रभु! मैं अशोकबाटिका में बैठा हुआ था, और सोच रहा था कि विदेहनंदिनी के चरणों में पहुँचकर कैसे आपका संदेश सुनाऊँ?
उसी समय उन राक्षसियों में एक महान भक्ता, उदार हृदया, त्रिजटा नाम की राक्षसी को मैं यह कहते हुए सुना कि लंका में एक बन्दर आया हुआ है, तो लगा कि यहाँ सपने में भी सत्य देख लेने वाले संत मौजूद हैं। पर मुझे इससे भी बड़ा आश्चर्य तब हुआ, जब त्रिजटा ने कहा-सपने बानर लंका जारी-यानी वह बानर लंका को जलायेगा।
तो मैं बड़े चक्कर में पड़ गया कि मुझे तो आपने लंका जलाने के लिए कहा नहीं है। और वह आगे कहती है कि-
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गये दिन चारी।।
यह सत्य होकर रहेगा। मैंने सोचा आपने संदेश सुनाकर लौट आने के लिए कहा था, और आपकी भक्त त्रिजटा कह रही है कि-लंका जलाना है-तो मैं सोचने लगा कि आपकी बात मानें या भक्ता त्रिजटा की बात मानें?
और तब मुझे लगा कि-जैसे किसी को कोई संदेश दिया गया हो और उसमें बाद में कुछ और जोड़ना हो, तो वह किसी अन्य के द्वारा बाद में भिजवा देते हैं।इसी तरह आपने यह संदेश मुझे त्रिजटा के द्वारा भेजवा दिया।
पता कैसे चला? बोले रावण की सभा में मैं कोई लंका जलाने की योजना लेकर गया नहीं था। लेकिन जब रावण ने कहा कि बन्दर की पूँछ में कपड़ा लपेट कर, घी, तेल डालकर, आग लगा दो, तो मैं समझ गया कि लंका जला डालने की पूरी योजना आपने पहले से ही बना ली है, और सारा प्रबंध आपने रावण से ही करा दिया। तो महाराज! सच तो यह है कि लंका तो उसी समय जल गयी, जब त्रिजटा का सपना मैंने सुना। मैं समझ गया कि आपके मन में लंका पहले ही जल चुकी है।
अब आप श्रीमद्भागवत्गीता की ओर ध्यान करें, तो लगता है, भगवान श्रीकृष्ण ने पहले गीता का उपदेश किया, उसके बाद अर्जुन ने युद्ध किया।और तब योद्धा मारे गये। पर यह जीव की दृष्टि है। ईश्वर की दृष्टि क्या है? भगवान ने अर्जुन को जब अपना विराट रूप देखाया, तो विराट रूप दिखाने से पहले अर्जुन से कह दिया, जरा मेरी आँखों से देख-
दिब्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमेश्वरम्।।
और जब अर्जुन ने देखा, तो क्या दिखाई पड़ा कि, कृष्ण भगवान के विराट रूप में भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि सब मरे पड़े हैं। अर्जुन बड़े चक्कर में कि महाराज! ये मर गये हैं कि मारना है। भगवान ने कहा कि-
जीव दृष्टि से मारना है। ईश्वर की दृष्टि से मर चुके हैं।
तुम अपनी आँखों से देखोगे अगर संसार को, तो लगेगा कि यह घटना बाद में हुई, पर अगर मेरी आँखों से देखोगे, तो तुम्हें लगेगा कि कुछ नहीं, यह तो सब कुछ पहले ही हो चुका है।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्त मात्रं भव सब्यसाचिन।।
और इसका अर्थ क्या? कि एक दृष्टि से देखें तो गीता उपदेश के बाद भीष्म, द्रोण आदि मारे गये और एक दृष्टि से तो गीता उपदेश के पहले ही वे सब मारे जा चुके थे।
हनुमानजी का तात्पर्य भी यही था कि बहिरंग दृष्टि से लोगों को भले लगता हो कि बाग पहले उजड़ा और लंका बाद में जली, पर मेरे विचार से तो आपके मन में लंका पहले जल चुकी थी, इसलिए मैं दावे से कह सकता हूँ कि लंका बाग उजड़ने से पहले जली, बाद में नहीं।
इस प्रकार आप देखते हैं कि हनुमानजी के चरित्र में न कर्तृत्व है, न कर्म फल। और इसके साथ साथ उनके चरित्र में आत्म विज्ञापन का तो लेशमात्र नहीं है।
विभीषणजी ने पूछ दिया कि आपका परिचय क्या है? तो उनका परिचय, तो राम से भी बड़ा चमत्कारी है।हनुमानजी को सामने देखकर विभीषण को किसकी याद आयी?
-जैसे, हवा के झोंके से हमें और आपको फूलों की याद आती है, वैसे ही हनुमानजी का झोंका जब आता है तो लोगों को भगवान की याद आती है। यही लगता है कि कहीं साक्षात् भगवान तो नहीं आ गये।
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